भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

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चूंकि व्यष्टि जीवात्मा स्वरूपतः अणु-परिमाण है, अतः वह स्वयं को अनेक शरीरों के रूप में विस्तृत नहीं कर सकता; इसलिए ये शरीर उस अणु-आत्मा के ही उपकरण (वैभव) होने चाहिए। न ही यह कहा जा सकता है कि उपनिषद् का यह कथन असत्य है, क्योंकि यह मुक्ति की अवस्था का निरूपण करने वाला प्रकरण है। यहाँ वर्णित शरीर वस्तुतः विद्यमान होना चाहिए, तथा यह पूर्व कर्म-बन्धनों से जनित नहीं हो सकता। इसकी व्याख्या आगे स्मृति-शास्त्र के प्रमाण द्वारा की जाएगी। अगले सूत्र में श्रीव्यासदेव अपना सिद्धान्त-मत व्यक्त करते हैं— ॥ ब्रह्मसूत्रम् ४।४।१२ ॥ द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥ १२ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: द्वादशाह-वत् — बारह दिनों के यज्ञ (द्वादशाह) के समान; उभय-विधम् — दोनों प्रकार का; बादरायणः — भगवान् बादरायण व्यास; अतः — इसलिए (सत्यसङ्कल्प होने के कारण)। सूत्रार्थ: भगवान् बादरायण व्यास का मत है कि मुक्त पुरुष द्वादशाह यज्ञ की भाँति (सशरीर एवं अशरीरी) दोनों प्रकार का होता है। ॥ श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्यम् ॥ भगवान् व्यासदेव का विचार है कि मुक्त जीव के सभी सङ्कल्प तत्काल सत्य एवं सिद्ध होने के कारण दोनों ही अवस्थाएँ सत्य मानी जानी चाहिए; क्योंकि शास्त्रों में दोनों ही स्थितियों का प्रतिपादन मिलता है। अतः यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि मुक्त आत्मा सशरीर भी हो सकता है और शरीर-रहित (अशरीरी) भी। यह दृष्टान्त द्वादशाह यज्ञ के समान है। बारह दिनों का द्वादशाह यज्ञ यजमान के सङ्कल्प-भेद से या तो 'सत्र' कहलाता है (जिसमें अनेक यजमान होते हैं) अथवा 'अहीन' कहलाता है (जिसमें एक यजमान होता है)। इसमें कोई विरोध नहीं होता। उसी प्रकार मुक्त पुरुष भी अपने सङ्कल्प के अनुसार शरीर धारण भी कर सकता है अथवा अशरीरी भी रह सकता है; यही इसका तात्पर्य है। यथार्थ यह है कि जो दिव्य तत्त्वज्ञान के प्रभाव से प्राकृत बन्धन से मुक्त हो चुके हैं, वे उस स्थिति को प्राप्त होते हैं जहाँ उनके समस्त मनोरथ स्वतः सिद्ध होते हैं। उनमें से जिनकी शरीर धारण करने की इच्छा होती है, वे अपनी इच्छानुसार तत्काल शरीर प्राप्त कर लेते हैं, जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् (७।२६।२) में वर्णित है—"स एकधा भवति त्रिधा भवति..."। और जिनकी शरीर धारण करने की इच्छा नहीं होती, वे अशरीरी रहते हैं; जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् (८।१२।१) में वर्णित है—"अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः"। जो मुक्त भक्त परमेश्वर की सेवा हेतु नित्य दिव्य चिन्मय शरीर धारण करने का सङ्कल्प करते हैं, वे अपनी स्वरूप-शक्ति से उस नित्य दिव्य शरीर को नित्य प्रकट रखते हैं। इसे इसी प्रकार समझना चाहिए। बृहदारण्यकोपनिषद् (२।४।१४) में कहा गया है: श्रुति-प्रमाण: यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ॥