भारतकोश
गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण

गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण

Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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ट्रेवेलियन ने इसका उत्तर दिया था कि, 'मुझे पूर्ण विश्वास है कि भारतवासियों को अंग्रेजी शिक्षा देने से आखिरी परिणाम यह निकलेगा कि उनके इंग्लैण्ड से अलग हो जाने का काम अनंतकाल तक असंभव बन पाएगा'।

'इसके विपरीत मेरा दृढ़ ख्याल यह है कि यदि भारतवासियों की शिक्षा प्रणाली को यथावत् छोड़ दिया जाए तो किसी भी दिन हम यहाँ से बहुत जल्द खदेड़ दिये जायेंगे'।

'मैंने बारह साल तक भारत में निवास किया है। प्रथम छह साल उत्तर भारत में गुजारे, जहाँ अंग्रेजी शिक्षा का इतना बोलबाला न था, लेकिन उनकी प्राचीन परंपराएं और शिक्षा कार्य जारी थे, जिससे वे अंग्रेजों को अपना जानी दुश्मन मानते और उन्हें हटा देने के लिये षड्यन्त्रों का आयोजन करते। जहाँ तहाँ भारत में से हमें खदेड़ देने की ही बातें सुनाई देती'।

'लेकिन मैं कलकत्ता आया। वहाँ अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव के कारण दूसरे ही हालात देखने को मिलें। लोग हमें उखाड़ फेंकने के बजाय, स्वतंत्र अखबार निकालने का, नगरपालिकाओं की स्थापना और अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार कर अधिकाधिक सरकारी नौकरियाँ प्राप्त करने आदि के बारे में ही सोचते थे। वे वास्तव में पूरे अंग्रेज-परस्त बन गये थे'।

वह प्रसिद्ध पत्र – (Sir Charles Trevelyan before parliamentary Committee of 1853)

ई.स. 1853 की इस सर्वांगीण सोच विचार के बाद इस कंपनी के नियामकों ने 16 जुलाई, 1854 के रोज 'एज्युकेशनल डिस्पेच' के नाम से प्रसिद्ध हुआ पत्र गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी पर भिजवाया।

इस पत्र में नियामकों ने लिखा था कि 'शिक्षा की इस नई योजना का आशय शासनतंत्र के प्रत्येक विभाग को विश्वसनीय और काबिल नौकर-कलर्क दिलवाने का है। उसका दूसरा हेतु यहा है कि इंग्लैण्ड के उद्योग-धंधों के लिए जिन अनेक