भारतकोश
गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण

गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण

Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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रहे हैं, उन सबका विश्वास ऐसे विचारों की तरफ दृढ़ होता जा रहा है। समय की देर है, कभी भी ज्वालामुखी फट सकता है।

शिक्षा को धर्मानुसारी बनाने की आवश्यकता है....

-इन्दुमती कटदरे

सयोंजक, पुनरुत्थान विद्यापीठ, अहमदाबाद

मनुष्य वैसा ही होता है जैसी शिक्षा उसे मिलती है। समाज भी वैसा ही होता है जैसी उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। समाज यदि संकटग्रस्त है, मनुष्य यदि दीन-हीन, दुर्गुणी और दुराचारी है और समाज के लिए कंटक समान है तो समझना चाहिए कि उस समाज की शिक्षाव्यवस्था ठीक नहीं है।

आज ऐसी ही स्थिति है। समृद्धि और संस्कृति दोनों ही क्षेत्र में केवल हमारे ही देश ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व की स्थिति चिन्ता करने योग्य है। कितने ही देश भुखमरी की अवस्था में पहुँच गए हैं। संस्कारों का हास हो रहा है। स्वतंत्रता, मानवीय गौरव, सुरक्षा, समृद्धि, सद्गुण आदि मनुष्य-जीवन को गौरवान्वित करने वाले तत्वों का अभाव चारों ओर दिखाई दे रहा है। इन सभी संकटों से यदि मानव-समूह को मुक्त करना हैं तो शिक्षा के विषय में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

पुनर्विचार करते समय ध्यान में रखने की बात यह है कि सुसंस्कृत समाज का निर्देशन, नियमन और नियंत्रण करने वाला तत्व धर्म है। 'धारणाद्धर्म इत्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः' सम्पूर्ण लोक को धारण करता है इसीलिए यह धर्म है। आज भले ही अनेक प्रकार के निहित स्वार्थों तथा अज्ञान के कारण धर्म को उलटी सुलटी व्याख्याओं से उलझा कर उसके अर्थ का अनर्थ कर दिया गया हो, धर्म के बिना प्रजा की सुस्थिति हो नहीं सकती। समाज जीवन धर्मानुसारी होना चाहिए यह निर्विवाद सत्य है।