गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण
Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन को धर्मानुसारी होने के लिए शिक्षा को धर्मानुसारी होना चाहिए। शिक्षा ज्ञानसत्ता है। धर्मसत्ता और ज्ञानसत्ता मिलकर ही समाजजीवन को सही दिशा देते हैं।
हम देख रहे हैं कि आज की शिक्षा धर्मानुसारी नहीं रह गई हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों में मोक्ष लक्ष्य है और धर्म अधिष्ठान है। अर्थ और काम को धर्म के अविरোধी होना चाहिए। यह सुसंस्कृत और समर्थ समाज की रीति है। परंतु आज सब कुछ अर्थ के नियंत्रण में चलता है। धर्म को अर्थ के आगे गौणत्व प्राप्त हुआ है। जब अर्थ सब से अधिक प्रभावी होता है और शेष सब उसके गौणत्व में होते हैं तब समाज में असंस्कृति की प्रतिष्ठा होती है और समृद्धि भी क्षीण होती है।
समाज को इस संकट से बचाने के लिए शिक्षा धर्मानुसारी बने इस बात की चिन्ता करनी चाहिए। यह चिन्ता शिक्षकों को करनी चाहिए, यह तो ठीक हैं, परंतु इसका सही अधिकार धर्माचार्यों का है। संपूर्ण समाज का और शासन का भी मार्गदर्शन करने का अधिकार धर्माचार्यों का है।
वर्तमान में इस परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। वास्तव में इसकी आवश्यकता निरंतर होती ही है क्योंकि धर्म पर चलने वाला समाज ही श्रेष्ठ और चिरजीवी समाज होता है।
A photograph showing a large group of men, mostly in white dhotis, sitting on a wooden platform that extends over a pond. The pond is filled with green lily pads. The men are arranged in several rows, some sitting on the platform and others on the ground. They appear to be engaged in a formal gathering, possibly a religious or educational session. The background shows lush green trees and foliage.
भारत को धर्मनिष्ठ बनकर विश्व का मार्गदर्शन करना है। यह उसका ईश्वरप्रदत्त कर्तव्य है। इस कर्तव्य को निभाने के लिए उसे समर्थ बनना