गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण
Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउन्हें न उस लकड़ी का ज्ञान रह गया हैं जो उन्हें पड़ोस के जंगल से मिल जाया करती थी और जिससे उनके पिता हल बनाया करते थे, न ही उन्हें उस लकड़ी को बचाने व उसके संवर्धन की आवश्यकता महसूस हो रही है। इससे यहाँ स्थानीय कौशल लुप्त होता जा रहा हैं, वहीं स्थानीय संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय लोगों के भूमिका भी समाप्त होती जा रही हैं।
स्थानीय संसाधनों व स्थानीय कौशल की वकालत करते हुए इस लेख का उद्देश्य विकास के चक्र को वापिस घुमाना नहीं है। उसे युगानुकूल बने हुए भी, उसकी देशानुकूलता बनाए रखना हैं, हमारा समाज स्वभाव से ही उद्यमी रहा हैं, अब तक की सरकारी नीतियाँ व तथाकथित प्रगतिवादियों द्वारा बनाए वातावरण के कारण उसकी उद्यमिता को जबरदस्त धक्का पहुँचा है। अगर ट्रेक्टर ने हल और बैलगाड़ी को बेमानी बना दिया है, तो इसलिए क्योंकि हमारी पंरपरागत उद्यमिता कहीं उनके शोर में दब कर रह गई है।
आज आवश्यकता है, हमें अपने कारीगरी कौशल को फिर समझने की, उस पर गर्व करने की, कारीगर बंधु अपने भीतर छिपे हनुमान की शक्ति को स्वयं पहचानें, उसे जगाने के लिए किसी जाम्बवंत का इंतजार न करें।
आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने विविध डिग्रीओं के धारक व्यक्तियों का निर्माण किया है। पर एक अच्छे मानवसमूह का निर्माण करने में वह असमर्थ रही है।