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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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पृष्ठ 102

१६ हम्मीररासो वार्ता ( वचनिका ) राव जैत पदमं ऋषि की आज्ञा तैं गढ़ रणथंभ की नीम दिवाई। ताही समय सहर बसावन की मन मैं आई। ( रणथंभ की नीम का लग्न ) ग्यारा सै दसोत्तरा कौ संवत् बैसाख की आखै तीज (अक्षय त्रितिया) मैं सनिस्रचर मैं घड़ी पाँच दिन चढ़े मिथुन लग्न मैं नीम दीनी। गणेश पूजकर सिवजी की और पद्म ऋषि की आज्ञा पाय अनेक उछाह करि धन दीनौ। चौपाई जैत राव थिर थूणी रुंधिय × । भूसुर बृंद वंदि पद उत्थिय ॥ ध्वजा पताक कलस अरु तोरन। मंगलरूप सुरूप निचोरन ॥९१॥ इष्ट लग्न सू० ५ ॥ २ । ८ ॥ १ । ०० चं० ३ । ४ । मं० ७ । ३०० । २० । वृ० ८ । १७ । शु० २ । ७ श० ११ । १ । रा० २ । ६ के० । ३ छंद भुजंगप्रयात पुरं मंदिरं चौहटं औ गवाक्ष्यं + । भुजंगप्रयातं सुंदरं प्रबंधं सुभाष्यं ॥ पुरी इंद्र की सीस वै सुभ्र देखी। सबै मंदिरं सुंदरं उच्च लेखी । ९२ ॥ पड़द्दा जरी बाफतं * कै बनाए। × रुंधिय=रुँधा, स्थिर किया। + गवाक्ष्यं (गवाक्ष)=झरोखा।

  • बाफतं (बाफता)=एक प्रकार का रेशमी वस्त्र जिसपर कलाबत्तू और रेशमी बूटियाँ होती हैं। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri