हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ हम्मीररासो अथ पद्मऋषि तपपात प्रसंग छप्पय रणतभँवर ऋषिद्म उग्रतप तेज कराए१। इंद्रासन डिगमगिय२ देवपति३ संका खाए॥ तब कामादिक बोलि सक्र ऋषि पास पठाए। करो बिघ्न तब जाय भंग पर काज नमाए४। तब चल्यव मार निज सेन जुत५ ऋतु वसंत प्रगटिय तुरत। बह त्रिविध पवन अद्भुत महा करहिं६ गान रंभा सुरति ॥९९॥ बसंत ऋतु वर्णन छंद पद्धरी तिहिं समय काम प्रेरयौ सुरिंद्र। जुहारि इंद्र उठि पाव वंदि॥ सब परिकर बोले७ चढ़ि सुमार। ऋतु छहूँ संग धनु सुमन हार ॥ १०० ॥ रति परम प्रिया ऋतुराज जानि। नित रहत निरंतर रूप मानि॥ बहु किन्नर गावत देवनारि। गंधर्व संग अति बल उदार ॥ १०१ ॥ संगीत भाव गावैं अनंत। सुर नर सुनंत बसि होत मंत॥ बन उपबन फुल्लहिं अति कठौर। रहे जौर मौर रस अंबमौर ॥१०२ ॥ १ करायौ । २ डगमग्यौ । ३ इन्द्र मन माहिं ( माँझि ) डरायौ । ४ नठाए । ५ जुरि । ६ करति । ७ बुल्ले । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri