हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
DevanagariHindipublished258 पृष्ठ
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हम्मीररासो १६ कल कूजत कोकिल ऋतु बसंत । सुनि मोहत जहँ तहँ सकल जंत ॥ नर नारि भए कामंध अंध । तजि लाज काज परि काम-फंद ॥ १०३ ॥ पहुँचे सुमारि ऋषि निकट आय । प्रेरेचौ सु परम भंट अग्ग जाय ॥ ऋषि लखे सुभट सेना सुकाम । ऋषि कह्यौ कहा करिहै सुबाम ॥ १०४ ॥ करि कठिन आप लाई समाधि । तिहिं रहत काम क्रोधारि व्याधि ॥ ग्रीष्म ऋतु वर्णन ऋतु ग्रीषम कौ आज्ञा सु दिन्न । तिहिं अति प्रताप जाज्वल्लि किन्न ॥ १०५ ॥ रबि तपै बिखम अति किरन धूप । रवि नै १ खुल्लि दिक्खिय अनूप ॥ वट इक्क महा गह्नर सुजानि । तिहिं निकट सरोवर सुरस मानि ॥ १०६ ॥ इक आश्रम सुंदर अति अनूप । तिय गान करत सुंदर सरूप ॥ सौरभ अपार मिलि मंद पौन । मृगमद कपूर मिलि करत गौन ॥ १०७ ॥ श्रीखंड *मेद १ केसर उसीर । तिहिं परसि ताप मिट्टत सरीर ॥ १ मेरु ।
- मेद=कस्तूरी । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri