हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० हम्मीररासो गंधर्ब और किन्नर सुबाल । मिलि अंग रंग पहरैं सुमाल ॥ १०८ ॥ चित चल्यौ नाहिं ऋषि बज्रमॉँन । रहिग्रीष्म १ ऋतू हिय हारि मॉँन ॥ १०९ ॥ दोहरा छंद लग्यौ न ग्रीषम कौ कछू, ऋषि प्रताप तपधीर । तब पावस परनॉँम करि, आयस कॉम गहीर ॥ ११० ॥ वर्षा ऋतु वर्णन छंद भुजंगप्रयात उठे बद्दलं घोर आकास भारी । भई एक बारं अपारं अँध्यारी ॥ बहैं पौन चारस्यों महा सीतकारी । चहूँ ओर क्रोधंत दामनि अँध्यारी ॥ १११ ॥ घने घोर गज्जंत बर्षंत पानी । कलापी पपीहा रटैं भूरि बानी ॥ तहाँ बाल भूलंत गावंत भीनी । रही जाय आश्रम भई कॉमभीनी ॥ ११२ ॥ उड़ैं चीर सम्मीर लग्गंत अंगं । लसे गात देखंत जग्गै अनंगं ॥ करैं सोर झिल्ली घने दद्दुरंगे । तहाँ बाल लीला करैं कॉम संगे ॥ ११३ ॥ निकट्टं उघट्टंत संगंत बाला । बरं अंग अंगं रची फूलमाला ॥ —————— १ ग्रीष्म । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri