हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ४५ छप्पय छंद मृगया महँ जिहिं समय, सकल भुल्लिय १ बन माहीं । महा घोर तम भयौ, तहाँ २ वरनी नहिं जाही ॥ तदिन सेख संयोग, आनि हमसैं तब मिल्लिव । नहिंन सेख तकसीर, देखि मन मोरहिं चिल्लिव ॥ संयोग भोग बिछुरन मिलन, लिख्यौ बिधाता ज दिन जहँ । नहिं टरै लाख कोऊ करो सुतौ होय वह ३ त दिन तहँ ॥२५३॥ दोहरा छंद मैं सेखहिं जाँनत नहीं, सेख न जाँनत मोहिं । होनहार संजोग जो,४ मिटै न उतनी होहि ॥ २५४ ॥ सुरति करत सिंह जु उठ्यौ, लख्यौ सेख सति भाय । लै कमाँन मारचौ तुरत, तज्यौ न आसन आय ॥ २५५ ॥ सुनू स्वभाव ज सेख के, लच्छिन कहे जु आप । मैं सभीति भइ सिंह तैं, कहे मोहिं बिन पाप ॥ २५६ ॥ त्रोटक छंद सुनिये पन सेख करे निज ये । घर बैठत बाँ जल सों रजए ॥ नहिं भोजन सोहि गरम्म करै । उकरू नहिं बैठत भुंमि भरै ॥२५७॥ सरणागत आवत नाहिं तजै । पर बाम लखे मन माहिं लजै ॥ जहँ जाचत प्राण न राखत है। नहिं झूठ अकारन ५ भाखत है ॥२५८॥ १ भूले । २ तहाँ कछु बर्नि न जाही । ३ वहाँ । ४ तैं । ५ अकारथ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri