भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 258 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 132

४६ हम्मीररासो रण मैं नहिं पिट्ठि दई कबहुँ । लखि आरतिवंतन सौं अबहूँ ॥ तहँ मेटत आरति वार तिहीं । बिन आसन बैठत है कबहीं ॥२५६॥ मुख सैं उचरै न टरै कबहीं । सब तैं मधुरे मुख बैन सही ॥ दृग लाज भरे रिझवार घनैं । रहनी करनी कविराज भनैं ॥२६०॥ महिमा महिमा नहिं जात कही । जस चाहक गाहक गाहक ही ॥ बरबीर महाररणधीर अरै । खँग खेत गहै अरि खंड करै ॥२६१॥ सुनि साहि मनै अचिरज्ज भयौ । ततकाल जु सेख बुलाय लयौ ॥ छिरकाय धरा जल सौं जु भरे । बहु भोजन आनि गरम्म घरे ॥२६२॥ तर गेरि पटंबर अंबरयं । करि पालथि छोरिय कंमरयं ॥ बहु भाँति सिराहि सुभाय मनं । करिये तब भोजन आय¹ अनं ॥२६३॥ मिलिए सब जो कछु बाल कहे । महिमा तिय जानि सनेह लहे² ॥ प्रजुरे पतिसाहि सु कोप कियं । मनु³ ज्वाल बिसाल सुघृत्त दियं ॥२६४॥ दृग लाल बिसाल सुबंक भुवं । १ आप । २ लग । ३ जनु । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास) · पृष्ठ 132, कुल 258 में से · BharatKosha