हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ हम्मीररासो रण मैं नहिं पिट्ठि दई कबहुँ । लखि आरतिवंतन सौं अबहूँ ॥ तहँ मेटत आरति वार तिहीं । बिन आसन बैठत है कबहीं ॥२५६॥ मुख सैं उचरै न टरै कबहीं । सब तैं मधुरे मुख बैन सही ॥ दृग लाज भरे रिझवार घनैं । रहनी करनी कविराज भनैं ॥२६०॥ महिमा महिमा नहिं जात कही । जस चाहक गाहक गाहक ही ॥ बरबीर महाररणधीर अरै । खँग खेत गहै अरि खंड करै ॥२६१॥ सुनि साहि मनै अचिरज्ज भयौ । ततकाल जु सेख बुलाय लयौ ॥ छिरकाय धरा जल सौं जु भरे । बहु भोजन आनि गरम्म घरे ॥२६२॥ तर गेरि पटंबर अंबरयं । करि पालथि छोरिय कंमरयं ॥ बहु भाँति सिराहि सुभाय मनं । करिये तब भोजन आय¹ अनं ॥२६३॥ मिलिए सब जो कछु बाल कहे । महिमा तिय जानि सनेह लहे² ॥ प्रजुरे पतिसाहि सु कोप कियं । मनु³ ज्वाल बिसाल सुघृत्त दियं ॥२६४॥ दृग लाल बिसाल सुबंक भुवं । १ आप । २ लग । ३ जनु । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri