हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ४७ रद दाबत १ ओठ सु ओठ दुवं ॥ करि क्रोध तवै पतिसाहि कहै । उर मै अति क्रोध २प्रचंड दहै ॥२६५॥ सुनि जाँमहिं जो तकसीर परै । तिहिं कौ न कहो अब दंड धरै ॥ कर जोरि उठ्यौ महिमा तबहीं । हम तो तकसीर भरे सबहीं ॥२६६॥ तुव गर्दन वेग कबूल करो । है तकसीर जु सेख भरो ॥ तब सेख कहै कर जोरि तवै । करिये मन भावतु है जु अचै ॥२६७॥ तब बोलि हुरम्म कहै मुख तैं । पहलैं तकसीर परी हम तैं ॥ गरदन्न कबूल करी अबहीं । पहलैँ हम तैं तकसीर भई ॥२६८॥ समझे पतिसाह तबै मन मैं । अबला हठ नाहिं मिटै मन ३ मैं ॥ इनकौ सब बेगम लोग कहैं । मन चाहत सो हठता जु गहैं ॥२६९॥ दोहरा छंद हुरम बचन सुनि साह तब, मन बिचार तहँ कीन ४। बेगम जाति जु तीय की, इन मरवै मन दीन ५ ॥२७०॥ जाहु सेख इत ६ मति रहो, जहाँ लगि मेरो राज । जो राखै ७ ताकौ हनूँ, प्रगट सुसाज़ समाज ॥२७१॥ १ दब्बत । २ कोप । ३ तन । ४ किन्न । ५ दिन्न । ६ इह । ७ रक्खै । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri