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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

४६ हम्मीररासो रण मैं नहिं पिट्ठि दई कबहुँ । लखि आरतिवंतन सौं अबहूँ ॥ तहँ मेटत आरति वार तिहीं । बिन आसन बैठत है कबहीं ॥२५६॥ मुख सैं उचरै न टरै कबहीं । सब तैं मधुरे मुख बैन सही ॥ दृग लाज भरे रिझवार घनैं । रहनी करनी कविराज भनैं ॥२६०॥ महिमा महिमा नहिं जात कही । जस चाहक गाहक गाहक ही ॥ बरबीर महाररणधीर अरै । खँग खेत गहै अरि खंड करै ॥२६१॥ सुनि साहि मनै अचिरज्ज भयौ । ततकाल जु सेख बुलाय लयौ ॥ छिरकाय धरा जल सौं जु भरे । बहु भोजन आनि गरम्म घरे ॥२६२॥ तर गेरि पटंबर अंबरयं । करि पालथि छोरिय कंमरयं ॥ बहु भाँति सिराहि सुभाय मनं । करिये तब भोजन आय¹ अनं ॥२६३॥ मिलिए सब जो कछु बाल कहे । महिमा तिय जानि सनेह लहे² ॥ प्रजुरे पतिसाहि सु कोप कियं । मनु³ ज्वाल बिसाल सुघृत्त दियं ॥२६४॥ दृग लाल बिसाल सुबंक भुवं । १ आप । २ लग । ३ जनु । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ४७ रद दाबत १ ओठ सु ओठ दुवं ॥ करि क्रोध तवै पतिसाहि कहै । उर मै अति क्रोध २प्रचंड दहै ॥२६५॥ सुनि जाँमहिं जो तकसीर परै । तिहिं कौ न कहो अब दंड धरै ॥ कर जोरि उठ्यौ महिमा तबहीं । हम तो तकसीर भरे सबहीं ॥२६६॥ तुव गर्दन वेग कबूल करो । है तकसीर जु सेख भरो ॥ तब सेख कहै कर जोरि तवै । करिये मन भावतु है जु अचै ॥२६७॥ तब बोलि हुरम्म कहै मुख तैं । पहलैं तकसीर परी हम तैं ॥ गरदन्न कबूल करी अबहीं । पहलैँ हम तैं तकसीर भई ॥२६८॥ समझे पतिसाह तबै मन मैं । अबला हठ नाहिं मिटै मन ३ मैं ॥ इनकौ सब बेगम लोग कहैं । मन चाहत सो हठता जु गहैं ॥२६९॥ दोहरा छंद हुरम बचन सुनि साह तब, मन बिचार तहँ कीन ४। बेगम जाति जु तीय की, इन मरवै मन दीन ५ ॥२७०॥ जाहु सेख इत ६ मति रहो, जहाँ लगि मेरो राज । जो राखै ७ ताकौ हनूँ, प्रगट सुसाज़ समाज ॥२७१॥ १ दब्बत । २ कोप । ३ तन । ४ किन्न । ५ दिन्न । ६ इह । ७ रक्खै । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

४८ हम्मीररासो कट्टन गरदन जोग तू, कीनौ १ कुविध २ खरान । को रक्खै ३ या भूमि पर, रक्खि ४ करै को जवान ॥२७२॥ छप्पय छंद यह महि मँडल जितो, आँन मेरी सब मांनैं। खूनी रक्खै कौन, कोउ ऐसा तू जानै ॥ हम तैं बली बताय, ओट जाकी तू तकै। बचै न काहू ठौर, एक बिन गए न मक्कै ॥ कर जोरि सेख इम उच्चरै, बली एक साहिब गिनूँ। निर्वीज धरा ५ कबहुँ न है, ६ मैं हमीर स्रवनन सुनूँ ७ ॥२७३॥ तब सुसेख सिर नाय, रजा हजरति जो पाऊँ । जौ न गिनै पतिसाह, सर्न मैं ताकी ८ जाऊँ ॥ तुमहिं न नाऊँ सोस, नहिंन फिरि दिल्लिय आऊँ । जुद्ध जुरे नहिं टरौं, हत्थ तुम कौ जु दिखाऊँ ॥ यह कहत सेख सल्लम किय, तबहिं चला चलचित्त भुब । निज धाम आय अप अनुज सों, बिबर बिबर बातें जु हुब ॥२७४॥ छंद पद्धरी आए जु सेख घर तब सरोष । जिय जान्यौ अपनो सकल दोष ॥ मिलिय ९ जु मीर गबरू सुधाय । चलचित्त देखि तिहिं पूछि १० जाय ॥२७५॥ किहिँ हेतु आज चिंतत सुभाय । किहिँ कियव वैर सो मुहिँ ११ बताय ॥ तिहिँ मारि करूँ ततकाल टूक १२ ।

१ किन्नौ । २ कुबदि । ३ राखै । ४ राखि । ५ भुंमि । ६ हैं । ७ गिन्यौ, सुन्यौ अंत्यानुप्रास । ८ जाकी । ६ मिल्ली । १० पुच्छि । ११ मो । १२ दुक्क । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ४९ हिय क्रोध अगिन साँ^१ उठत ऊक^२ ॥२७६॥ को^३ करै बैर बिन कर्म्मबीर । मिट^४ गये अन्न जल को सु सोर ॥ तिहिं^५ कौन रहै रक्खै सु कौन । यह जानि मर्म तुम रहो मौन ॥२७७॥ यह सुनत मीर गबरू सुभाय । सो^६ पर्यौ धर्नि मुच्छा सु खाय ॥ तदि कर्यौ बोध यहु बिधि सुताहिं । नहिँ करो सोच रहो^७ निकट साहि ॥२७८॥ तब कहूँ मीर गबरू सु ताहिं । सब तजो देश मक्के सु जाहि ॥ कै रहो राव हम्मीर पास । तन रहै खुसी नासै जु त्रास ॥२७६॥ तब चलिव सेख तजि साहि देस । सब^८ सुभट संग लिन्हे^९ सुबेस ॥ सत पंच सैन गजराज पंच । रथ सत्थ लिये निज नारि संच ॥२८०॥ सब रखत साज निज संग लीन । दासी^१० जु दास सुंदर नवीन ॥ सजि साज बाज डेरे अनूप । लदि ऊँट किते सँग चलिय^११ जूप ॥२८१॥ चढ़ि^१२ सैन सज्योँ निज संग बाँम । १ यौं । २ हूक हुक्क । ३ महिमा साहोवाच । ४ मिटि अन्न जहाँ जाके सनीर । ५ तव । ६ सुइ परचो धरनि मुर्छा सुखाइ । ७ रहु । ८ निज । ६ लीन्हे । १० सब दासि दास । ११ चले । १२ सजि सेख चढ्यौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

५० हम्मीररासो बज्जिव निसाँन गज्जिव सु ताँम ॥ मग चलत करत मृगया अनेक । मिलि चलिय१ सकल बर बीर एक२ ॥२८२॥ जिहिं मिलै राव राजा सु जाय । पतिसाहू बैर सुनि रहै चाय ॥ चहुँ चक्क फिरयौ महिमा सुधीर । नहिं३ कह्यौ रहन काहू सुबीर ॥२८३॥ द्वै४ दीन सेख देखे सुझारि । बिन राव दसौँ दिसि फिरिव हारि ॥ तब तक्कि५ सेख हम्मीर राव । सोइ आइ सरन परसे जु पाव ॥२८४॥ दोहरा छंद गढ़ बंका६ वंको सुधर, बंका६ राव हमीर । लखि प्रतीति मन महँ७ भइय, हर्षे महिमा मीर ॥२८५॥ देखि जलासय बिटप बहु, उतरि सुडेरा कीन८ । हय गय बंधे तरुन तर, खाँन पाँन बिधि लीन९ ॥२८६॥ डेरा ड्यौढ़ी करि खरे, करी बिछायती बेस । करि१० मसलति कौँ सलि जुरी, सब भर सरस सुदेस ॥२८७॥ मंत्री मंत्र सुपूच्छि११ तब, इक चर लीन सु बोलि । जाहु राव के पास तुम, कहो बात सब खोलि१२ ॥२८८॥ प्रथम सलाँम कहो जु तुम, बिरत१३ कहो सु बिसेष । हुकम होय जो मिलन कौं, तो हजूर है सेख ॥२८६॥ इतने मैं जानी परै, पन भ्रम प्रीति प्रतीति । १ चलै । २ केक । ३ नन कह्यौ । ४ द्वै, दोउ दोन, दोय । ५ तके । ६ बंको । ७ जिय मैं । ८ किन्न । ६ लिन्न । १० करी कचहरी आप तत्र । ११ पुच्छि । १२ बुल्लि, खुल्लि । १३ वृत्त, वृत्तांत । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हर्ष सोक यहिँ गति लख्यौ, तुम जानत सब रीति ॥२६०॥ तब सु दूत गय राव पहँ, करी खबरि दरबाँन । बोलि हजूरि सुदूत कौ, पूछत कुसल सुजाँन ॥२९१॥ सकल बात सुनि दूत मुख, हर्ष राव बहु कीन१ । तबहिं उलटि पठयौ सु वह, सेख बुलाय सुलीन२ ॥२९२॥ नाराच छंद चल्यौ जु सेख राव पहँ बनाय साज कीनयं३ । तुरंग पंच नाग एक साज साजि लीनयं४ ॥ कमाँन दोय टंकनो सु देस मुल्लताँन की । कृपाँन एक५ बेस देस पालकी सुजाँन की ॥२६३॥ लिये सु दोय बज्र लाल एक५ मुक्त मालयं । कही जु एक५ दोय बाज स्वाँन दोय पालयं ॥ सवार एक आपही सबै 'पयाद चल्लियं । रहे तनक्क पौरि जाय फेरि अग्ग हल्लियं ॥२६४॥ सुबेतहार अग्ग६ जाय राव कौ सुनाइयं । हमीर राव बेगि आय७ रावतं खँदाइयं ॥ चले लिवाय सेख कौ जहाँ जु राव बट्टियं । सभा समेत राव देखि सेख कौ सु उठ्ठियं ॥२९५॥ मिले उभै समाज सौं कुसल्ल छेम पुच्छियं । परस्सि पानि पाव सेख हाथ८ जोरि सुच्छियं ॥ करी जुअग्ग सेख भेंट बुल्लियौ सु बाचयं । सरन्नि राव राखि९ राखि मैं सरन्नि साचयं ॥२६६॥ फिरचौ सु मैं सु दीन दोय खाँन जाँति सब्वयं । जितेक राज रावताय छत्र जाति सब्वयं ॥


१ किन्न । २ लिन्न । ३ किन्नयं । ४ तुरंग पंच नाग इक्क साज सज्जि लिन्नयं । ५ इक्क । ६ अग्र । ७ आप । ८ हत्थ । ६ रक्खि रक्खि ।

५२ हम्मीररासो दिसा दसौँ जितेक भूप और बीर बंक जे । रहो कह्यौ सु कौन हू रहूँ तहाँ सुधीर जे १ ॥२९७॥ हँसे हमीर राव बात सेख की सुनंतही । कहा अलावदीन, पातसाह, सोभनंतही ॥ रहो यहाँ अभै सदा हमीर राव यों कहै । तजूँ ज तोहिं प्राण साथि और बात यों २ कहै ॥२९८॥ चौपाई छंद राव हमीर नजरि सब रक्खिय । बचन सेख कौ यहि बिधि भक्खिय ॥ तन धन गढ़ घर ए सब जावैँ । पै महिमा पतिसाह न पावैँ ॥२९९॥ कहै सेख प्रण समुझि सु किज्जिय ३ । मेरी प्रथम अर्ज सुनि लिज्जिय ४ ॥ दसों दिसा मैं मैं फिरि आयव । जिते खाँन सुलतान सु गायव ॥३००॥ गजा राँन. राव जितने जग । दीन होय देखे ५ सु अगम मग ॥ बाँध तेग साहस करि कोई ६ । तजै लोभ जीवन को सोई ७ ॥३०१॥ यह जिय जानि बास मुहिं दीजे ८ । सेख राखि ९ सरनै जस लीजे १० ॥ इतनी धरा सेष सिर होई । कहै साहि रक्खै नहिँ कोई ॥३०२॥ १ सुतंक जे । २ त्यों । ३ कीजे । ४ लीजे । ५ दिक्खे । ६ कोइय । ७ सोइय । ८ दिजिय । ९ रक्खि । १० लिजिय । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ५३ छप्पय छंद बार बार क्यों कहै सेख उत्कर्ष बढ़ावै। एक¹ बार जो कही बहुरि कछु और कहावै² ॥ प्रथम बंस चहुवाँन टेक गहि कबहुँ न छंदै। बहुरि राव हम्मीर हठ न छुटै तन खंडै ॥ थिर रहहु³ राव इम उच्चरै न डरि न डरि अब सेख तुव ॥ उगै न सूर जो तजहुँ⁴ तोहिं चलहिं५ मेरु अरु भुम्मि ध्रुव ॥२०३॥ बकसि सेख कौ बाजि⁶ साज कंचन के साजे। मुक्त माल सिरपेंच जटित हीरा⁷ छबि छाजे ॥ सकल सथ्थ सिरपाव साल दिन्नव अति⁸ भारिय। पंच लक्ख को पटौ दियौ आदर भुवकारिय९ ॥ दिन्नी सुठौर¹⁰ सुंदर इकै¹¹ तिहिं देखत¹² हिय हर्षियउ। उछाह सहित उठि सेख तब आनँद मंगल बर्षियउ ॥३०४॥ दोहरा छंद महिमा साह जु तुरतही¹³ गए हवेली आप। देखत ही सब भाँति सुख मिटी सकल तन ताप ॥ महिमानो पठई नृपति, सबै सथ्थ के हेत। खाँन पाँन लायक जिते, मधु आमिष¹⁴ सु समेत ॥३०५॥ ज दिन सेख दिल्ली तजी, दूत सथ्थ दिय ताहिं। को रक्खै कित¹⁵ जात यह, लखो जु तुम हूँ वाहि ॥३०६॥ राख्यो¹⁶ राव हमीर तब, महिमा साहु जु पास। कहै राव सों दूत तब, मत रक्खो तुम¹⁷ पास ॥३०७॥ १ इक्क। २ कढावै। ३ होहु। ४ तजों। ५ चलैं। ६ वाच। ७ हीरन। ८ असि। ९ बहुधारिय। १० जु। ११ यकै। १२ पिक्खत। १३ तुरत तब। १४ अमिपहा। १५ कत जाइ यह। १६ रक्खिउ। १७ निज बास। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

५४ हम्मीररासो अलादीन सू¹ औलिया, फिरत चहूँ दिसि आनि । निबल सबल के बाद सों, किन सुख पायौ जानि ॥३०८॥ ·मुक्तादाम² छंद कहै तब दूत सुनो नृप बात । बड़ो तुव बंस प्रताप सुहात³ ॥ तजो⁴ रतनागर को सर हेत । रत्न अमूल्य⁵ तजो रज हेत ॥३०९॥ कहो गुन कौन रखे इहि⁶ सेख । जरत्त जु बाल गहो⁷ सुबिसेष ॥ अजाँन असी जु करै नहिं राव । सुनो⁸ तुम नीति जु राज स्वभाव ॥३१०॥ तजो अब इक्क⁹ कुटुंब बचाय । तजो गृह इक्क सुग्राम सहाय ॥ तजो पुर इक सुदेस बचाय । तजो सब आतम हेत सुभाय ॥३११॥ महा यह नीच अधम्मिय¹⁰ सेख । टरचौ नहिं स्वामि तिया गुन देख ॥ बढ़ै पतिसाह¹¹ दिलीपति¹² बैर । लख्यौ नहिं आँनन प्रात सुफेर ॥३१२॥ प्रलै जिहिं रोष तजै धर देह । हमीर सु राव सुनो रस¹³ भेव ॥ बढ़ै निति नेह तुमै पतिसाह । अमीरस मैं बिष घौरत काह ॥३१३॥ १ से । २ मोतीदाम । ३ सुतात । ४ तजो सरनागत । ५ अमोल । ६ इह । ७ गही । ८ सुनी । ९ एक । १० अधर्मिय । ११ पुनि साह । १२ दिलीसहिं । १३ इह । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

३. तृतीय भाग: अलाउद्दीन खिलजी की चढ़ाई, नुसरत खान वध व रणथम्भौर घेरा

हम्मीररासो ५५

परो १ फिर आप नहीं दुख आय । तजो यह जानि प्रथम्म सुभाय ॥ जथा वह रावन जित्ति २ त्रिलोक ३ । सुरन्नर नाग रहैं तिहिं ओक ४ ॥३१४॥ करचौ तिन बैर जबै रघुनाथ । मिट्यौ गढ़ लंक सुबंकम पाथ ५ ॥ कहो सर ६ कोन करैं पतिसाह । करै तब जंग बचो नहिं ताहि ७ ॥३१५॥ छप्पय छंद कह हमीर सुनि दूत बचन निज असत भाखौं । मो बिन ८ और न कोय सेख को सरनै राखौं ॥ गहूँ खाग ९ सनमुक्ख दुहुँ अति गर्व सुद्ध द्रढ़ । लहै मुक्ति मग सत्य किधौं रणथंभ महा गढ़ ॥ कहियो निसंक पतिसाह सों सेख सरनि हम्मीर किय । सामाँन युद्ध जेते कछू सो अनंत दुग्गह जु लिय ॥३१६॥ दातार छंद सुनि हमीर के बचन, दूत दिक्खिय दिस आयव । करि सलाँम कर जोरि, साह कौं १० सीस नमायव ॥ पूरब दच्छिन देस और पच्छिम दिसि आयव । सवै सेख फिरि थकि, कहूँ काहू न रखायव ॥ तब सेख आय रणथंभ गढ़, दीन बचन इम भक्खियौ ११ । सुनि हमीर करुणा सहित, सेख बचन दै राक्खयौ १२ ॥३१७ ॥ महरम खाँ वजीरोवाच समद पार गय सेख, बार हजरत वह नहीं ।


१ परै । २ जीति । ३ तिलोक । ४ वोक । ५ माथ । ६ सरि । ७ आहि । ८ मुझ बिन । ६ तेग । १० सौं । ११ भाखियौ । १२ राखियौ ।

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५६ हम्मीररासो राव शेख क्यों रखै, रहत हजरत घर माहीं ॥ फिर न कहो यह वचन, बृथा¹ कबहूँ² अनजानै । दूत साह के बचन, सुने सत्कार सुमानै ॥ महरम्म खाँन इम उच्चरै, खबरदार नहिं बेखबरि । कहिये जु बात निज द्रगन लखि, असी बात नहिं कहो फिरि ॥३१८॥ दोहरा छंद महरम खाँ उजीर सों, कहैं बैन पतिसाहि । इक फरमाँन हमीर कौं, लिखि भेजहु अब ताहि ॥३१६॥ छप्पय छंद लिखि हजरति फरमाँन उलटि एलची पठाए । हठ मति करो हमीर चौर मति रखो पराए ॥ हम दिल्लो के ईस राव तुमहूँ जु कहावो । बढ़े अलसि जिय माहिं³ बैर मैं कहा जु पावो ॥ माल मुलक चाहो जितौ, कहै साहि बहु लिज्जिये⁴ । फरमाँन वाँचि⁵ जिय राव तुम, चोर हमारौ दिज्जिये⁶ ॥३२०॥ दोहरा छंद वाँचि³ राव फुरमाँन तब, दियउ सेस तब अंग । वचन दिये मैं सेख कौं, करों शाह सों जंग ॥३२१॥ दियउ⁷ उलटि फरमाँन तब, राव साहि कौ ज्वाब । रख्यौ महिमा साहि मैं, तजूँ न तिहिं मैं अब ॥३२२॥ यह फरमाँन जु बाँचि³ कै, करिव साह तब क्रोध । खिज्यौ देखि पतिसाह कौ, कियौ उजीर सुवोध ॥३२३॥ छप्पय छंद कित्तौ गढ़ रणथंभ राव जिस पहँ गर्बाए । दसूँ देस बसि किये जीति करि पाँव लगाए ॥ १ व्यर्थ । २ कबहूँन । ३ माँझ । ४ लीजिए । ५ वंचि । ६ दीजिए । ७ दियौ ।

हम्मीररासो ५७ ईस कहौ अब्र कोन जुद्ध जो हम सौं मंडै । देत दुनी तैं कढ्ढि गर्व नातैं क्यों मंडै १ ॥ साहिब्ब बचन इम उच्चरै अली औलिया पोर गनि । महिमा साह जु रक्खि तुव अजहूँ समुझि हमीर मनि२ ॥३२४॥ दोहरा छंद दूजा हजरति का लिख्या, बाँचि राव फरमाँन । बार बार क्यों लिखत है, तजूँ न हठ की बाँन ॥३२५॥ पच्छिम सूरज उग्गवै, उलटि गंग बह नीर । कहो दूत पतिसाह सौं, तौ हठ न तजै हमीर ॥३२६॥ छप्पय छंद दियौ पद्म ऋषिराज करौं जब लग मैं सोइय । जो गढ़ आयौ निमत साह रक्खै नहिं कोइय ॥ अनहोनी नहिं होय होय होनी हैं सोइय । रजिक३ मोति हरि हथ्थ डर सु मानव क्यों कोइय ॥ नहिं तजूँ सेख को प्रण करिव सरन धरम छत्रिय तनौं । नन है बिचित्र महिमा तनो सत्य बचन मुख तैं भनों ॥३२७॥ चले दूत सुरझाय, दिलिय दिसि कियौ पयानो । गढ़ रणथँभ हम्मीर साह कैसै कम जानो ॥ हयद़ल पयद़ल सेन सूर बर बीर सवायौ । हठी राव चहुवाँन बंस यहि हठ चलि आयौ ॥ यहि बिधि सु तुमहूँ धर लखै४ हरे५ सकत्त तुम बीर बर । अब पतिसाह जु एक भुव६ कै तुम कै जु हमीर बर ॥३२८॥ सुनत दूत कै बचन साहि जब मन मुसकाए । कितो राज हम्मीर करै हठ मोहिं बुलाए ॥ १ तंडै । २ तुव । ३ रिजक । ४ लिखै । ५ हरयौ । ६ भव । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

५८ हम्मीररासो कितेक गढ़ इक्क ठौर किते उमराव महाबल। किते बाजि गजराज किते भट बंक महाबल १ ॥ तुम कहो सकल समझाय मुहिं किहिं हेतु इतै २ गर्वहिं बढ़ै। हम्मीर राव चहुवाँन कै कितौ ३ नृपनि ४ दल सँग चढ़ै ॥३२६॥ हजरति राव हमीर बार बहुतैं समझायव। सुनि महिमा को नाँम रोष करि गव रिसायव ॥ करौं जुद्ध तिर सुद्ध साह दल खंडि बिहंडौं। धरौं सीस हर कंठ सुजस तिहिं लोकहिं मंडौं ॥ हम्मीर राव इम उच्चरै गही टेक ५ छाँड़ौं नहीं। तन जाहु रहै जिय सोच ६ नहिं लाज धरम खंडौं नहीं ॥३३०॥ चौपाई छंद कहे साहि सुनु दूत सु बैनं। कहो ७ राव को पन ध्रम एनं ॥ कितौक दल बल सूर समाजं। कितेक गढ़ सामाँ घर राजं ॥ ३३१ ॥ रहनी करनी प्रजा प्रतापं। बानी ८ बिरद् ९ दाँन द्रब आपं ॥ नीति अनीति ग्राम गढ़ कैसा। सहर १० सरोबर बाट जु जैसा ॥ ३३२ ॥ सत्तरि सहस तुरंगम जानो। दोय लक्ख पयदल भरमानो ॥ सप्तपंच गजराज अमानो ११ । होहि कीच मद बहुत सुदानो १२ ॥ ३३३ ॥ १ बड़ा दल । २ येत । ३ कितका । ४ दसम । ५ तेग । ६ लोभ । ७ कहै । ८ बाना । ६ बिर्द । १० सहस रोष बाग जु जैसा । ११ मानै । १२ दानै । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ५९ रनथंभौर ग्वालियर बंका। नरवल¹ औ चित्तौड़ सु तंका ॥ रहै जखीरा गढ़ कै जेता। अनगिन² वस्तु न जानत तेता ॥ ३३४ ॥ तुरी सहस इकतीस सु सज्जै। अरु गजराज असी मद गज्जै ॥ सूर वीर दस सहस अमानो। इते राव रणधीर के जानो ॥ ३३५ ॥ दोहरा छंद मेटि मसोत (द) जु सकल तहँ,³ कीके⁴ मंदिर देस। बाँँग निबाज. न होय जहँ, स्रवन कथा हरि बेस ॥३३६॥ नहिं कुराँन कलमा नहीं, मुसलमाँन नहिं पीर। च्यारि बरण आश्रम सुखी, देस हमीर सु धीर ॥३३७॥ अपनै⁵ अपनै धर्म्म मैं, रहैं सबै नर नारि। राजनीति पन तेजजुत, फरै राव⁶ सुखकारि ॥३३८॥ कर काहू कै होय नहि, दुखी न कोऊ दीन। आश्रम किते नबीन⁷ है, ऊँवे मंदिर बीन⁸ ॥३३९॥ पद्धरी छंद रणथंभ दुग्ग बहु बिकट⁹ जानि। तिहिं दरा च्यारि मग सुगम मानि ॥ घाटी सु च्यारि अस्सी सु और। है गै न चलैं अति कठिन ठौर ॥३४०॥

१ नरवल मनु (मन) चीतोड़ सुतंका । २ अगणत । ३ तिहँ । ४ किन्नै । ५ अप्पन । ६ राज । ७ अनूप । ८ दीस, ईस, अंत्यानुप्रास । ९ दुर्ग बहु विधि सु । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

६० \t हम्मीररासो सरवर सु पंच जल अगम सोय । बहु रंग कमल फुल्ले सु जोय ॥ चहुँ ओर नीर को नहिंन छेह । परबत अनूप जल भरै एह ॥३४१॥ सो इहै अगम पहुँचे न खग्ग । गढ़ चढ़ै कवन जहँ इक्क१ मग्ग ॥ अरु भरे दोय भंडार अन्न । दस लक्ख कोरि दस सहस मन्न ॥३४२॥ दस लक्ख सूत सन्न घरे संचि । द्विप२ दोय लक्ख धरि धातु खंचि ॥ घृत सहस बीस मन भरे हौद । दोय लक्ख पैद चहुँ गढ़न कौद+ ॥३४३॥ बिन तोल नोन३ पर्वत सु तच्छ । दस सहस अमल आफू* सुलच्छ ॥ मृगमद कपूर केसरि सुगंध । भरि रहे भौन सौंधे सुबंध ॥३४४॥ नहिँ तोल तेल लोहा प्रमाँन । बारुद्व सुद्ध नव लच्छ जाँन ॥ अरु पतो जानि सीसो सु सुद्ध । नव लक्ख धरचौ संचय सुमुद्ध ॥३४५॥ अरु इतौ राव कै नित्त दाँन । पँच तोलि पंच मुहरैं सुमानि ॥ दस दोय धेनु तरुणी सु वच्छ । १ एक । २ द्वप । ३ लवण ।

  • कौद (कोद)—ओर । * आफू=अफीम ।

हम्मीररासो ६१ सोबरन १ स्रिंग स्रिंगार सुच्छ ॥३४६॥ यह अधिक जानि दीजे२ सु बिप्र । उगंत सूर दिज्जे३ सु छिप्र ॥ जीमंत बिप्र सब राजद्वार । लंगर सु अनगिनित बटत सार ॥३४७॥ बहु अंध पंगु अरु बधिर कोय । सो करैं४ भोज नृप कै सजोय ॥ दस दोय अन्न मन परै और । खग सकल चुगैं तहँ ठौर ठौर ॥३४८॥ गणनाथ आदि सब लसैं देव । नृप आप५ करत करि नमत सेव ॥ सिव बसैं नंदि भैरव समेत । भव भवा सबै परिकर समेत६ ॥३४९॥ द्रढ़ महा वंक गन्नेस गढ्ढ । बिन मग्ग सकै पंछी न चढ्ढ ॥ बड़ तोप सतरि गढ़ पै अचल्ल । तब छुटत सोर पर्वत७ सुहल्ल ॥३५०॥ छुटंत गर्भ सुकंत नीर८ । मन वज्रपात सुकत समीर ॥ आसा सु नाँम राणी सु एक । पतिब्रत्त धर्म्म देबी सु टेक ॥३५१॥ रणथंभ नाथ सुत इक्क९ पूर । चंड तेज मनूँ ऊगंत सूर१० ॥


१ सुवरन्न। २ दिज्जे । ३ दीजे । ४ सुइ करि भोजन । ५ अप्प । ६ सहेत । ७ पब्बय । ८ सूकंत नीर । ६ एक । १० चढ़ि तेज मनहुँ उग्गंत सूर । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

६२ हम्मीररासो रतनेस नाँम जम है बिख्यात । चित्तोड़ दुग्ग पालै सु तात ॥३५२॥ सँग रहै सुभट थट विक्ट संग¹ । को करै तिनहिं तैं रणहिं रंग ॥ तप तेज राव बृषभाँन जेम । पर दुख कट्टन बिक्रम सु तेम ॥३५३॥ देखंत² रूप मनु काँमदेव । सुइ काछ बाछ निकलंक भेव ॥ अरु खेत जुरे नहिं देत पिट्ठि । अरि लखत देखि नहिं परत³ दिट्ठि ॥३५४॥ बहु बाग चहूँ दिसि सघन हेरि । गंभीर गहर उपषन सु भेरि ॥ बहु अंब⁴ बृक्ष फल झुकत भार । दाड़िम समूह निंबू अपार ॥३५५॥ वहु सेवराज जामुन समूह । नारंग रंग महुवा समूह ॥ खिरनी सकेलि नारेल⁵ बृंद । खीरा कि चिरुँजी मधुर कंद⁶ ॥३५६॥ कटहल कदंब बड़हल अनेक । महुवा अनंत कद्दलि बिसेक(ष)⁷ ॥ तहँ मोलसिरी सोहैं गंभीर । माघी सकेत सोहंत धीर⁸ ॥३५७॥ फुलवारि गुंज अति अमर होत⁹ ।


१ बिकट थट्ट रह सुभट संग । २ पिक्खंत । ३ परम । ४ आम्र । ५ नरियल । ६ कंज । ७ ऊभरि अनंत घोटा सु एक । ८ मधि किते सरणँ (सहं) सोहंत कीर । ६ फुलवारि भौर गुंजार होत । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

प्रफुल्लिन¹ गुलाब चंपा उदोत ॥ कहूँ² रहे केतिक्की वृंद फुल्लि । अहि भ्रमर गंध सहि रहे भुल्लि ॥३५८॥ कहूँ रहे केवरा जुही जाय । संदुप्य³ ओर संभो सु आय⁴ ॥ आचीन नरगिस औ असोक⁵ । पाटल⁶ सचमोलिय बोलि कोक⁷ ॥३५९॥ एला लवंग अंगूर वेलि । माधुज्ज लता माधुरी मेलि ॥ तरु ताल तमाल रु ताल और । ता मध्य कमल अरु कुमुद भौर ॥३६०॥ चहुँ ओर सघन पर्वत सुगंध । जलजंत्र छुटै ऊचे सवंध ॥ पिक मोर हंस चकवा बिहंग । सुक चाय(त)क कोकिल रमत संग ॥३६१॥ चहुँ ओर बाग बारी अनूप । तिहि मध्य दुर्ग रणथंभ भूप⁸ ॥३६२॥ यह दूत के बचन सुनि दरबार कियौ ।⁹ छप्पय छंद क्या हमीर मगरूर पलक मैं पाय लगाऊँ । खूनी महिमा साह उसे गहि दिल्लिय लाऊँ ॥ १ फुल्लित । २ बहु । ३ संदूप । ४ सब्बो सु आम । ५ आचीन नग- रसा (नरगसा) औ असोक । ६ पाडल । ७ सतवर्ग और श्रीखंड कुंद, किंसुक सुमालती सेवतिहिं मंद । मधुबन बसंत सिंगार हार, मोतिया मदनसर फुल्ले-२ । ८ मध्य दुग्ग दुग्गं सुभूप । ६ दूत के बचन सुने तब पातसाह ने दरबार कर्यौ ।

६४ हम्मीररासो जाति राव हम्भीर तोरि गढ़ धूरि मिलाऊँ । इती जो न अब करूँ१ तौ न पतसाह२ कहाऊँ ॥ केतोक राज३ रणथंभ को इतो कियो अभिमाँन तिहिं । कोपि४ साह भेजे जबै दसौं देस फर्मान जिहिं ॥३६३॥ सुने दूत के बचन साह जिय संका आय। चढ़ौ कोपि बिन समुझिवहाँ कैसी बनि जाइयं ।। हार५ जीति रब हाथि६ आप संमत जग होई । तातैं मंत्री मित्र मंत्र७ दृढ़ किज्जिय८ सोई ।। यह जानि साह दीवाँन किय खाँन बहत्तरि इक्क९ हुव। यह हठ हमीर को सुन्यौ तब रक्खे सेख सरन्न भुब ॥३६४। आँम खास उमराब सबै पतिसाह बुलाए। राजा राणा राव खाँन सुलताँन सु आए ॥ हठ हमीर 'मुझि करिव सेख सरनै निज रक्ख्यौ । दियौ दूत कौ ज्व ब बचन बहु अनबन भक्ख्यौ ।। सब तंत मंत जानो सु तुम देस काल बुधि इष्ट ध्रुव । जिहिं जाहु१० जाहुजस बुद्धि ह्वै कहो११ 'नित्ति'१२ उत्तम सु भुवा। ३६५॥ कहैं सकल उमराव ईस तुम सम नहिं कोई । तेज प्रतापउरु बुद्धि और दूजो नहिं कोई१३ ॥ फिर फिर जो फरमाँन राव कौ कहा जु लिख्वय । जो उपजै यहि बार सोइ प्रभु आपनु अख्विय१४ ॥ चढ़िए सिकार गीदड़ तणी तऊ सिंह के बाँधि१५ सर । १ हरौं । २ मैं साह । ३ राव । ४ कुप्पि साह पठाए जबै देस देस फुरमाँन जिहिं । ५ हारजिंति । ६ हत्थ । ७ पूँछि । ८ कीजे । ६ एक । १० जाहि जाहि । ११ कहा । १२ नीति । १३ साहि तुम जानत साई ( नहिं होई ) । १४ करिय प्रभु अप्पन अख्खिय, लिखिए, अखिए अंत्यानुप्रास । १५ वधि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ६५ फिरि लरो मरो १ संदेह नहिं तंत मंत यह ही सुबर ॥३६६॥ महरम खाँ उज्जीर साह सौं ऐसैं भाषै २ । चहुवाँनन की बात सबै अगली मुख भाषै ३ ॥ पहले हसन हुसैन सयद् ४ चहुवाँन सुपैले ५ । सात बेर पृथिराज गहे गवरी गहि मेले ६ ॥ बीसल दे अरु पिथ ये जड़ पीर करे अजमेर हनि ७ । महरम खान् इम उच्चरै असो वस चहुवाँन गनि ८ ॥ ३६७ ॥ गीदड़ सिंह सिकार, साह ९ एकौ मति जानो । रणतभँवर दिस भला १०, आप मति करो पयानो ॥ वहाँ राव हम्मीर, और रणधीर अमानो । अरु सामंत अनेक, अधिक तें अधिक बखानों ॥ बहु दुग्ग ११ चक रणथंभ गढ़ १२, यह बिचारि जिय लिज्जिए । तुम अलावदी पीर अति, आप मुहिम्म न किज्जिए ॥३६८॥ दोहरा छंद बहु दुग्ग चक रणथंभ बड़, तुम अलावदी पीर । दुहुँ करामाति सम गनो, आप और हम्मीर ॥३६९॥ छप्पय छंद कालदूत को १३ सेखं, एक हजरति बनवावो १४ । ताहि मारि तजि रोष, कह जिय क्रोध बढ़ावो ॥ लगै प्राण धन दोड, तबै बाजी कोड पावै । १ मिलो । २ भक्खै । ३ चहुवाँनन की बत्त सव्य अग्गालि मुख अक्खै । ४ सैद । ५ पिल्लिय । ६ साह गोरी गहि मल्लिय । ७ बीसल दे अरु पिथ वड़ पीर करिय अजमेर हनि । ८ पन । ९ सोइ यह इक न जानो । १० भुल्लि । ११ दुर्ग । १२ बड़ । १३ को । १४ चनवायौ, बढ़ायौ अंत्यानुप्रास । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri