हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ५३ छप्पय छंद बार बार क्यों कहै सेख उत्कर्ष बढ़ावै। एक¹ बार जो कही बहुरि कछु और कहावै² ॥ प्रथम बंस चहुवाँन टेक गहि कबहुँ न छंदै। बहुरि राव हम्मीर हठ न छुटै तन खंडै ॥ थिर रहहु³ राव इम उच्चरै न डरि न डरि अब सेख तुव ॥ उगै न सूर जो तजहुँ⁴ तोहिं चलहिं५ मेरु अरु भुम्मि ध्रुव ॥२०३॥ बकसि सेख कौ बाजि⁶ साज कंचन के साजे। मुक्त माल सिरपेंच जटित हीरा⁷ छबि छाजे ॥ सकल सथ्थ सिरपाव साल दिन्नव अति⁸ भारिय। पंच लक्ख को पटौ दियौ आदर भुवकारिय९ ॥ दिन्नी सुठौर¹⁰ सुंदर इकै¹¹ तिहिं देखत¹² हिय हर्षियउ। उछाह सहित उठि सेख तब आनँद मंगल बर्षियउ ॥३०४॥ दोहरा छंद महिमा साह जु तुरतही¹³ गए हवेली आप। देखत ही सब भाँति सुख मिटी सकल तन ताप ॥ महिमानो पठई नृपति, सबै सथ्थ के हेत। खाँन पाँन लायक जिते, मधु आमिष¹⁴ सु समेत ॥३०५॥ ज दिन सेख दिल्ली तजी, दूत सथ्थ दिय ताहिं। को रक्खै कित¹⁵ जात यह, लखो जु तुम हूँ वाहि ॥३०६॥ राख्यो¹⁶ राव हमीर तब, महिमा साहु जु पास। कहै राव सों दूत तब, मत रक्खो तुम¹⁷ पास ॥३०७॥ १ इक्क। २ कढावै। ३ होहु। ४ तजों। ५ चलैं। ६ वाच। ७ हीरन। ८ असि। ९ बहुधारिय। १० जु। ११ यकै। १२ पिक्खत। १३ तुरत तब। १४ अमिपहा। १५ कत जाइ यह। १६ रक्खिउ। १७ निज बास। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri