हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० \t हम्मीररासो सरवर सु पंच जल अगम सोय । बहु रंग कमल फुल्ले सु जोय ॥ चहुँ ओर नीर को नहिंन छेह । परबत अनूप जल भरै एह ॥३४१॥ सो इहै अगम पहुँचे न खग्ग । गढ़ चढ़ै कवन जहँ इक्क१ मग्ग ॥ अरु भरे दोय भंडार अन्न । दस लक्ख कोरि दस सहस मन्न ॥३४२॥ दस लक्ख सूत सन्न घरे संचि । द्विप२ दोय लक्ख धरि धातु खंचि ॥ घृत सहस बीस मन भरे हौद । दोय लक्ख पैद चहुँ गढ़न कौद+ ॥३४३॥ बिन तोल नोन३ पर्वत सु तच्छ । दस सहस अमल आफू* सुलच्छ ॥ मृगमद कपूर केसरि सुगंध । भरि रहे भौन सौंधे सुबंध ॥३४४॥ नहिँ तोल तेल लोहा प्रमाँन । बारुद्व सुद्ध नव लच्छ जाँन ॥ अरु पतो जानि सीसो सु सुद्ध । नव लक्ख धरचौ संचय सुमुद्ध ॥३४५॥ अरु इतौ राव कै नित्त दाँन । पँच तोलि पंच मुहरैं सुमानि ॥ दस दोय धेनु तरुणी सु वच्छ । १ एक । २ द्वप । ३ लवण ।
- कौद (कोद)—ओर । * आफू=अफीम ।