हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
६० \t हम्मीररासो सरवर सु पंच जल अगम सोय । बहु रंग कमल फुल्ले सु जोय ॥ चहुँ ओर नीर को नहिंन छेह । परबत अनूप जल भरै एह ॥३४१॥ सो इहै अगम पहुँचे न खग्ग । गढ़ चढ़ै कवन जहँ इक्क१ मग्ग ॥ अरु भरे दोय भंडार अन्न । दस लक्ख कोरि दस सहस मन्न ॥३४२॥ दस लक्ख सूत सन्न घरे संचि । द्विप२ दोय लक्ख धरि धातु खंचि ॥ घृत सहस बीस मन भरे हौद । दोय लक्ख पैद चहुँ गढ़न कौद+ ॥३४३॥ बिन तोल नोन३ पर्वत सु तच्छ । दस सहस अमल आफू* सुलच्छ ॥ मृगमद कपूर केसरि सुगंध । भरि रहे भौन सौंधे सुबंध ॥३४४॥ नहिँ तोल तेल लोहा प्रमाँन । बारुद्व सुद्ध नव लच्छ जाँन ॥ अरु पतो जानि सीसो सु सुद्ध । नव लक्ख धरचौ संचय सुमुद्ध ॥३४५॥ अरु इतौ राव कै नित्त दाँन । पँच तोलि पंच मुहरैं सुमानि ॥ दस दोय धेनु तरुणी सु वच्छ । १ एक । २ द्वप । ३ लवण ।
- कौद (कोद)—ओर । * आफू=अफीम ।
हम्मीररासो ६१ सोबरन १ स्रिंग स्रिंगार सुच्छ ॥३४६॥ यह अधिक जानि दीजे२ सु बिप्र । उगंत सूर दिज्जे३ सु छिप्र ॥ जीमंत बिप्र सब राजद्वार । लंगर सु अनगिनित बटत सार ॥३४७॥ बहु अंध पंगु अरु बधिर कोय । सो करैं४ भोज नृप कै सजोय ॥ दस दोय अन्न मन परै और । खग सकल चुगैं तहँ ठौर ठौर ॥३४८॥ गणनाथ आदि सब लसैं देव । नृप आप५ करत करि नमत सेव ॥ सिव बसैं नंदि भैरव समेत । भव भवा सबै परिकर समेत६ ॥३४९॥ द्रढ़ महा वंक गन्नेस गढ्ढ । बिन मग्ग सकै पंछी न चढ्ढ ॥ बड़ तोप सतरि गढ़ पै अचल्ल । तब छुटत सोर पर्वत७ सुहल्ल ॥३५०॥ छुटंत गर्भ सुकंत नीर८ । मन वज्रपात सुकत समीर ॥ आसा सु नाँम राणी सु एक । पतिब्रत्त धर्म्म देबी सु टेक ॥३५१॥ रणथंभ नाथ सुत इक्क९ पूर । चंड तेज मनूँ ऊगंत सूर१० ॥
१ सुवरन्न। २ दिज्जे । ३ दीजे । ४ सुइ करि भोजन । ५ अप्प । ६ सहेत । ७ पब्बय । ८ सूकंत नीर । ६ एक । १० चढ़ि तेज मनहुँ उग्गंत सूर । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
६२ हम्मीररासो रतनेस नाँम जम है बिख्यात । चित्तोड़ दुग्ग पालै सु तात ॥३५२॥ सँग रहै सुभट थट विक्ट संग¹ । को करै तिनहिं तैं रणहिं रंग ॥ तप तेज राव बृषभाँन जेम । पर दुख कट्टन बिक्रम सु तेम ॥३५३॥ देखंत² रूप मनु काँमदेव । सुइ काछ बाछ निकलंक भेव ॥ अरु खेत जुरे नहिं देत पिट्ठि । अरि लखत देखि नहिं परत³ दिट्ठि ॥३५४॥ बहु बाग चहूँ दिसि सघन हेरि । गंभीर गहर उपषन सु भेरि ॥ बहु अंब⁴ बृक्ष फल झुकत भार । दाड़िम समूह निंबू अपार ॥३५५॥ वहु सेवराज जामुन समूह । नारंग रंग महुवा समूह ॥ खिरनी सकेलि नारेल⁵ बृंद । खीरा कि चिरुँजी मधुर कंद⁶ ॥३५६॥ कटहल कदंब बड़हल अनेक । महुवा अनंत कद्दलि बिसेक(ष)⁷ ॥ तहँ मोलसिरी सोहैं गंभीर । माघी सकेत सोहंत धीर⁸ ॥३५७॥ फुलवारि गुंज अति अमर होत⁹ ।
१ बिकट थट्ट रह सुभट संग । २ पिक्खंत । ३ परम । ४ आम्र । ५ नरियल । ६ कंज । ७ ऊभरि अनंत घोटा सु एक । ८ मधि किते सरणँ (सहं) सोहंत कीर । ६ फुलवारि भौर गुंजार होत । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
प्रफुल्लिन¹ गुलाब चंपा उदोत ॥ कहूँ² रहे केतिक्की वृंद फुल्लि । अहि भ्रमर गंध सहि रहे भुल्लि ॥३५८॥ कहूँ रहे केवरा जुही जाय । संदुप्य³ ओर संभो सु आय⁴ ॥ आचीन नरगिस औ असोक⁵ । पाटल⁶ सचमोलिय बोलि कोक⁷ ॥३५९॥ एला लवंग अंगूर वेलि । माधुज्ज लता माधुरी मेलि ॥ तरु ताल तमाल रु ताल और । ता मध्य कमल अरु कुमुद भौर ॥३६०॥ चहुँ ओर सघन पर्वत सुगंध । जलजंत्र छुटै ऊचे सवंध ॥ पिक मोर हंस चकवा बिहंग । सुक चाय(त)क कोकिल रमत संग ॥३६१॥ चहुँ ओर बाग बारी अनूप । तिहि मध्य दुर्ग रणथंभ भूप⁸ ॥३६२॥ यह दूत के बचन सुनि दरबार कियौ ।⁹ छप्पय छंद क्या हमीर मगरूर पलक मैं पाय लगाऊँ । खूनी महिमा साह उसे गहि दिल्लिय लाऊँ ॥ १ फुल्लित । २ बहु । ३ संदूप । ४ सब्बो सु आम । ५ आचीन नग- रसा (नरगसा) औ असोक । ६ पाडल । ७ सतवर्ग और श्रीखंड कुंद, किंसुक सुमालती सेवतिहिं मंद । मधुबन बसंत सिंगार हार, मोतिया मदनसर फुल्ले-२ । ८ मध्य दुग्ग दुग्गं सुभूप । ६ दूत के बचन सुने तब पातसाह ने दरबार कर्यौ ।
६४ हम्मीररासो जाति राव हम्भीर तोरि गढ़ धूरि मिलाऊँ । इती जो न अब करूँ१ तौ न पतसाह२ कहाऊँ ॥ केतोक राज३ रणथंभ को इतो कियो अभिमाँन तिहिं । कोपि४ साह भेजे जबै दसौं देस फर्मान जिहिं ॥३६३॥ सुने दूत के बचन साह जिय संका आय। चढ़ौ कोपि बिन समुझिवहाँ कैसी बनि जाइयं ।। हार५ जीति रब हाथि६ आप संमत जग होई । तातैं मंत्री मित्र मंत्र७ दृढ़ किज्जिय८ सोई ।। यह जानि साह दीवाँन किय खाँन बहत्तरि इक्क९ हुव। यह हठ हमीर को सुन्यौ तब रक्खे सेख सरन्न भुब ॥३६४। आँम खास उमराब सबै पतिसाह बुलाए। राजा राणा राव खाँन सुलताँन सु आए ॥ हठ हमीर 'मुझि करिव सेख सरनै निज रक्ख्यौ । दियौ दूत कौ ज्व ब बचन बहु अनबन भक्ख्यौ ।। सब तंत मंत जानो सु तुम देस काल बुधि इष्ट ध्रुव । जिहिं जाहु१० जाहुजस बुद्धि ह्वै कहो११ 'नित्ति'१२ उत्तम सु भुवा। ३६५॥ कहैं सकल उमराव ईस तुम सम नहिं कोई । तेज प्रतापउरु बुद्धि और दूजो नहिं कोई१३ ॥ फिर फिर जो फरमाँन राव कौ कहा जु लिख्वय । जो उपजै यहि बार सोइ प्रभु आपनु अख्विय१४ ॥ चढ़िए सिकार गीदड़ तणी तऊ सिंह के बाँधि१५ सर । १ हरौं । २ मैं साह । ३ राव । ४ कुप्पि साह पठाए जबै देस देस फुरमाँन जिहिं । ५ हारजिंति । ६ हत्थ । ७ पूँछि । ८ कीजे । ६ एक । १० जाहि जाहि । ११ कहा । १२ नीति । १३ साहि तुम जानत साई ( नहिं होई ) । १४ करिय प्रभु अप्पन अख्खिय, लिखिए, अखिए अंत्यानुप्रास । १५ वधि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ६५ फिरि लरो मरो १ संदेह नहिं तंत मंत यह ही सुबर ॥३६६॥ महरम खाँ उज्जीर साह सौं ऐसैं भाषै २ । चहुवाँनन की बात सबै अगली मुख भाषै ३ ॥ पहले हसन हुसैन सयद् ४ चहुवाँन सुपैले ५ । सात बेर पृथिराज गहे गवरी गहि मेले ६ ॥ बीसल दे अरु पिथ ये जड़ पीर करे अजमेर हनि ७ । महरम खान् इम उच्चरै असो वस चहुवाँन गनि ८ ॥ ३६७ ॥ गीदड़ सिंह सिकार, साह ९ एकौ मति जानो । रणतभँवर दिस भला १०, आप मति करो पयानो ॥ वहाँ राव हम्मीर, और रणधीर अमानो । अरु सामंत अनेक, अधिक तें अधिक बखानों ॥ बहु दुग्ग ११ चक रणथंभ गढ़ १२, यह बिचारि जिय लिज्जिए । तुम अलावदी पीर अति, आप मुहिम्म न किज्जिए ॥३६८॥ दोहरा छंद बहु दुग्ग चक रणथंभ बड़, तुम अलावदी पीर । दुहुँ करामाति सम गनो, आप और हम्मीर ॥३६९॥ छप्पय छंद कालदूत को १३ सेखं, एक हजरति बनवावो १४ । ताहि मारि तजि रोष, कह जिय क्रोध बढ़ावो ॥ लगै प्राण धन दोड, तबै बाजी कोड पावै । १ मिलो । २ भक्खै । ३ चहुवाँनन की बत्त सव्य अग्गालि मुख अक्खै । ४ सैद । ५ पिल्लिय । ६ साह गोरी गहि मल्लिय । ७ बीसल दे अरु पिथ वड़ पीर करिय अजमेर हनि । ८ पन । ९ सोइ यह इक न जानो । १० भुल्लि । ११ दुर्ग । १२ बड़ । १३ को । १४ चनवायौ, बढ़ायौ अंत्यानुप्रास । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
६६ हम्मीररासो तजे खेत जस १ जाय, बहुरि कछु हाथि न आवै ॥ खूती सरन हमीर कै, रह्यौ दीन जानै दोऊ । किज्जे मुहिम्म नहिं रात्र पै, या मैं तो सुख है सोऊ ॥३७०॥ मिस्र देस खंधार. खरे २ गज्जिनि ३ दल आये । अरु काबुल खुरसाँन, कोपि पतिसाह बुलाये ॥ रूम स्याँम कसमीर, और मुलताँन सु सज्जै । ईराँ तूराँ कटक, वलक आरब धर गज्जै ४ ॥ सब ५ देस रुहंग फिरंग कै, भबखड़ कै सज्जै सुबल । अल्लावदीन पतिसाह कै, चढ़े संग टिड्डी सु दल ॥३७१॥ चढ़े हिंद कै देस, प्रथम सोगठ गिरनारी । दच्छण ६ पूरव देस, लए दल बहल ७ भारी । अरु पहार कै भूप, और पच्छिम कै जानो । दसौं दिसा कै बीर, कहा कोड नाम बखानो ॥ ग्यारा सै अठतीस ८ ये, चैत्र मास द्वितिया प्रगट । चढ़े सुसाह अल्लावदी, कर हमीर पर कटक भट ॥३७२॥
- भुजंगप्रयात छंद चढ़े साहि कोपे ९ सु बज्जे निसाँनं । चढ़े मीर गंभीर सथ्य १० सुजाँनं ॥ उड़ी रेणु आकास सुझै ११ न भाँनं । धरा मेरु डुल्लै सु भुल्लै दिसाँनं । ३७३॥ सहै सेस भारं न १२ पारं न पावै । डगै कौल दिग्गज १३ अग्गै सुधावै ॥ १ सच । २ खड़े । ३ गजनी, गजनि । ४ ईरान त्वैर औ बलख ठठा ( ठट्ट ) भष्पर से गज्जे । ५ सब देस रुहैलरु फिरँग रूम झगड़ा कै सज्जै सुबल । ६ दक्खिन । ७ बल अति । ८ अटिसिये । ६ कोपं । १० सत्थै । ११ सूझै न नैनं । १२ सम्हारं न पावै । १३ दिग्गं सु अग्गै । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ६७ मनो छाड़ि१ बेला समुद्दं उमंडे किये२ हैं दलं पयदल रत्थ तंडे ॥३७४॥ चढ़े सत्त लक्खं सु हिंदू सयन्नं । सबौ बीस लक्खं मलेच्छं३ अयन्नं ॥ तहाँ डाक्र४ एकं सहस्सं दुपंचं । चले बेलदारं लखं कयारि संचं ॥३७५॥ चले एक५ लक्खं सु अगं६ सु सालं । अलीखाँन 'हम्मत्ति दाऊ हरोलं ॥ चले बाणियाँ संग व्यापार भारी। सु तो दोय लक्ख गिणौ संग सारी ॥३७६॥ चली लक्ख च्यार सु सग भियारी । पकावैं भुताँन 'खवै काँमचारी ॥ खर० गोखरू यों चले दोय लक्खं । फिरै कयारि लक्ख गसत्ती सु रक्खं ॥३७७॥ दुआगीर इक्कं सुलक्ख सुचल्ले : सु ता लंगरं सो सदा खाँन मिल्ले ॥ अरठब्बी लखं दोइ चल्ले सु संगं । रहे तोपखाने सदा जंग जंगं ॥३७८॥ भरे ऊँट वारूढ़ डेरा सुभारी । सु तो तीन लक्खं सजे संग सारी ॥ चले सहस पंचं मतंगं सु गज्जं । मनो पावसं मेघमाला सु रज्जं ॥३७९॥ लसैं बैरखं सो मनौं विज्ज १० भारी । १ छंडि । २ कियं, किते । ३ सुमिच्छं । ४ तहाँ पै कड़ाकं । ५ इक । ६ अग्रं । ७ गोखरं गोरसंगी । ८ गश्ती । ६ एकं । १० बीज ।
६८ हम्मीररासो बरै दाँन वर्षा मनो भुम्मि १ कारी ॥ लसै उज्ज्वलं दंत बग पंक्ति मानो । इती साह की सेन सब्जी सुजानो ॥३८०॥ गर्जत निसाँनं सु सज्जंत भानो । मनूँ पावसं मेघ गज्जैं सु मानो २ ॥ सबै सेन सज्जी चढ्यौ साहि कोपं । सबै पंच ३ चालीस लक्खं सु ओपं ॥३८१॥ तहाँ तीस ४ हुज्जार निस्साँन ५ बज्जैं । सु तो घोर सोरं सुने मेघ लज्जैं ॥ सताईस लक्खं महाबीर बंके । टरै नाहिं जंगं भए ताँम हंके ।३८२॥ परै ६ जोजनं अठ्ठ ७ औ दोय फौजं । कटे वंक वनं हटे नाहिं रोजं ॥ चढ़ं उव्वटं बाट थट्टे ८ सु चल्ले । मनो सायर ९ छंडिं १० बेला उगल्ले ॥३८३॥ जले सुक्कियं ११ नीर नाना सुथाँनं । बहैं औघट घाट दुट्टंत १२ माँनं ॥ कियौ कूच कूचं १३ चले मीर धीरं । परच्यौ जोर हम्मीर कै देस तीरं ॥३८४॥ भजे भुम्मियाँ भुम्मि चल्लं अपारं । गए पब्वंतं १४ बंक मैवास * भारं ॥ १ भूमि । २ भानो, जानो । ३ पाँच । ४ तीन । ५ नीसाँन । ६ परी । ७ आठ । ८ थारे । ६ सायरं । १० छाँडि । ११ सोखियं । १२ टूटंत । १३ कुच्च कुच्चं । १४ पव्यतं, पव्ययं । *मैवास ( मेवासा )=क़िला । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ६९ सबै राव हम्मीर कै देस माहीं । भए बीर संघीर जुद्धं समाहीं ॥३८५॥ तिहाँ¹बीचि मलहारणी इक्क² गढ़ढं । लरे राव कै रावतं जोर दड्ढं ॥ दिना तीन लौं सो कियौ जुद्ध भारी । फते³पातसा की भई बैनकारी ४ ॥३८६॥ चले अग्र ५ साहं सु सेना हँकारी । सुनी राव हम्मीर कुप्पे ६ सु भारी ॥ किये रक्त नैनं भृकुटी ७ क्रूरुं । लख्यौ रावतं जोर उट्ठे जरूरं ॥३८७॥ परी पक्खरं वाजि राजं सु सज्जे ८ । बजे नद्द निस्साँन ९ आकास लज्जे १० ॥ तबै राव हम्मीर कौ सीस नाए । बिना आयुसं साह पै बीर धाए ॥३८८॥ जुरे आय जुद्धं न दीजौ बनासं । चढ़े लक्ख चालीस औ पाँच तासं ॥ इतै राव हम्मीर कै पंच ११ सूरं । अभयसिंह पम्मार रठ्ठोर भूरं ॥३८६॥ हरीसिंह बघेल कूरम्म भीरं । चहूवाँन सद्दूल १२ अजमत्त सीमं ॥ त्रिभागै करी सेन बागैं उठाई । मिले बीर धीरं अमोरं हटाई ॥३९०॥ १ तहीं बिच्चि । २ एक । ३ भते । ४ बनकारी ( बन्नकारी ) । ५ अग्र । ६ कोपे । ७ भकुट्टी । ८ साजे । ६ नीसाँन । १० लाजे । ११ पाँच । १२ सार्दूल । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
७० हम्मीररासो दोहरा छंद पंच¹ सूर हम्मीर के, बीस सहस असवार² । उत सब दल पतिसाह को, बज्यौ परस्पर झार ॥३६१॥ नदी वना सज उप्परै, रत्ति³ बसिय पतिसाह । प्रात कुच्च४ नहिं करि सके, आय जुटे⁵ नरनाह ॥३६२॥ पद्धरी छंद . चढ़ि चले⁶ साह हरवल सभीर । तिहिं जुटे राव कूरम सबीर⁷ ॥ बघेल हरीसिंह अनिय वांधि । चंदे(दो)ल पयादे भिरिव संधि । ३९३॥ बिच गोल साह को जितो सुद्ध । तिन सूर राव कै करि⁸ न जुद्ध ॥ यहि भाँति पंच राउत अभंग । पतिसाह सेन सौँ जुटे जंग ॥ ३९४॥ कम्माँन स्रवन लगि करि कसीस । मनु प्रगट पन्थ भारत्थ सीस ॥ सर बरसत पावस मनो नीर । बहु बेधि कवच धर परत धीर ॥३९५॥ लगि सेल अंग नहिं पार होत । ससि कारि⁹ घटा मैं करि उदोत ॥ फिरवाँन बहैं करि करिव क्रोध । धर परत सीस धर उठत¹⁰ जोध ॥३६६॥ १ पाँच । २ अस्वार । ३ राति वसे । ४ कूँच । ५ जुटिय, जुटिग । ६ चलिय । ७ तहँ जुटिउ (जुटिग) राव कूरंम बीर । ८ करे । ९ कोरि । १० उठित, पुठत । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ७१ लगि होत कटारिय अंग पार। प्रासाद उच्च कै खुले द्वार ॥ बहु खंजर पंजर करत पार¹। ऊँची जु उठी सु तो रुहिर² धार ॥३९७॥ मनु पर्व्वत तैं, गेरू पनार। बहि³ चली⁴ अंग तैं सोन⁵ धार ॥ बहु घायल घुम्मत बहुत घाव। मनु केसिव⁶ किंसुक तरु सुहाव ॥३९८॥ चल परी साह दल मैं अपार। हा हंत सद⁷ औ दल मँझार ॥६९९॥ दोहरा छंद भगिय⁸ सेन पतिसाह की, लुटी जु रिद्धि अपार। तब मरहम खाँ साह सौं, अर्ज करी⁹ तिहिँ बार ॥४००॥ हजरति देस हमार को, निपट अटपटो जानि। भिल्ल कौल तस्कर सबै, और किरात सुमानि ॥४०१॥ सजग रहा निसि द्यौस सब, गाफलि रहो न मूर। हनिय सेन सब अपनिय¹⁰, तीस¹¹ हजार सपूर ॥४०२॥ घायल कौ लेखौ नहीं, हथ्थिय¹² परे सु बीस। परे बाजि सब ड्योढ़¹³ सत, सुनि जिय अचरिज दीस ॥४०३॥ परे राव कै बीर दस, घायल पंच पचीस। अभय¹⁴ सिंह पम्मार कै, भयौ घाव दस सोस ॥४०४॥ जाय जुहारे राव कौ, कही चमू की बात। तब हमीर सब तैं कही, बाहर लरो न तात ॥४०५॥ १ फार । २ रुधिर । ३ बहु । ४ चलिय । ५ रुधिर । ६ के सुव । ७ सब्द । ८ भगी । ६ करी अरज । १० आपनी । ११ तीन । १२ हाथी । १३ ड्योढ़ सौ । १४ अभय साहि पम्मार इक । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
७२ हम्मीररासो छप्पय छंद तब सु साह करि कुच्च १, चले २ रणथंभहिं आए। सकल सु संकित हियैं ३, मीर उमराव सुभाए। जल थल पाधरि सैन ऐन ४ चहुँ ओर सु दिक्खिव। चढ़ि अगार इक उच्च ५ राव बहु भाँति न लक्खिव॥ चहुवाँन राव हड़ हड़ ६ हँस्यौ ७ हेरि सैन इम उच्चरचौ ८। पतसाह किधौं सोहा जुगर मानो एक टाँडो परचौ ९ ॥४०६॥ दोहरा छंद फिरि पतिसाह हमीर कौ, लिखि पठए १० फरमाँन। अजहूँ ११ हिंदू समुझ तुव, मिलि तजि सब अभिमाँन ॥ ०७॥ छप्पय छंद मैं मक्के १२ को पीर दिली पतिसाह कहाऊँ। हिंदू तुरक दुराह १३ सबै इक सार चलाऊँ॥ बीर च्यारि अरु पीर रहें मुझ पर १४ चौरासी। महिमा साहि न रक्खि राव मति करै जु हाँसी। १५ तुम समुझि सोचि १६ जिय अप्पनै १७ कहा तोहिं फल ऊपजै। परचँड लाय उठठे जु सिर इक १८ सेख कौ नहिं तजै ॥४०८॥ फिर हमीर फरमाँन साहि कौं उलटि पठायौ। हजरति छत्री धर्म्म सुन्यौ नहिं स्रवनन गायौ॥ तुम मक्के कै पीर सूर सुरलोक कहाऊँ। तुम सरभर नहिं हसम साहि पल मैं १९ जु नसाऊँ॥ १ कूँच। २ दुग्ग। ३ हीय। ४ एन। ५ ऊँच। ६ हर,हर। ७ हँसिव। ८ उच्चरिव। ९ परिव। १० मेजिय। ११ अवहूँ। १२ मक्का का। १३ दाउ राह। १४ पै। १५ महिमा साहि हमीर राखि मति करै जु हाँसी। १६ देखि। १७ आपनै। १८ एक। १६ माँझ। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ७३ नहिं तजौं टेक छोड़ूँ१ न पन यह बिचार निहचै२ घरचौ३। छिन भंग अंग लालच कहा सुजस खोय जीवन करचौ४ ॥४०९॥ दोहरा छंद जैत छाँडि जोगी कहा, सत छँडै५ रजपूत। सेख न सौंपौं साह कौं, जव६ लग सिर साबूत ॥४१०॥ छप्पय छंद हजरति नई न करूँ करूँ जैसी७ चलि आई। मुसलमाँन चहुवाँन सदा ऐसी८ वनि आई॥ ख्वाजे मीराँ पीर खेत अजमेरि खिसाए।* असी सहस इक लक्ख बहुरि९ मक्का न दिखाए१० ॥ बीसल दे अजमेर गढ़ सो न्रगरा साकौ कियव। नन बरीय सुंदरी कुँवरि सो साह बहुत लालच दियव ॥४११॥ प्रथीराज वर सात साहि गवरी गहि छंड्यौ। कर चूरी पहिराय दंड करि कछुव न मंड्यौ ॥ ता पिच्छै गढ़ दिल्ली साहि गौरी चढ़ि११ आयव१२। रेण१३ कुमार अपार जुद्ध करि सुर पुर धायव१४॥ चहुवाँन बंस अवतंस जो खग्ग१५ त्यागि नाहिंन मुरचौ१६। १ त्यागूँ। २ निश्चय। ३ धरिब ४ करिव। ५ छाँड़ै। ६ जौलौं। ७ ऐसी। ८ तैसे। ९ उलटि। १० खिंदाए। ११ चलि। १२ आए। १३ रमण। १४ धाए। १५ खाग। १६ मुरयय।
- असुर मारि अजपाल चहूँ दिपि चक्र चलाए। बीसल दे अजमेरि पाय मँडलीक लगाए॥ चीरम दे जालोर गढ़ सो नगरै साकौ कियव। नन बरी जीभ सुंदरि कुँवरि साहच होत... ॥ १० CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
७४ - हम्मीररासो - छंडूहूँ १ नटेकयह बिरद मम सेख रक्खि २ जंगहिं करयौ ३ ।४१२। तजै सेस जो भुम्मि मेरु चल्लै ४ घर उप्पर। उलटि गंग बह नीर सूर उग्गै ५ पच्छिम भर॥ ध्रुव चल्लै आकास समद मरजाद सुछंडै। सतीसंग पति कढै बहुरि घर आय ६ सुमंडै॥ थिर रह्यौ न यह संसार कोइ सुनो साहि साखी सु ध्रुव ७। दसकंध धरणि अज्जुन जिसा स्वप्नहिं ८ सम दिखंत ९ मुव ॥४१३॥ दोहरा छंद कलि मैं अमर जु कोइ १० नहिँ ११, इसम देखि नहिं भूल । तुम से किते अलावदी, या धरती १२ पर धूलि १३ ॥४१४॥ अपने कौ सूर न गिने, कायर गिनै न और । अपनी कीरति आप १४ मुख, यह कहबौ नहिं जोर ॥४१५॥ लिखे लेख करतार कै, हजरति मेट १५ न कोय । को जाणै रणथंभ गढ़, अब यह कैसो १६ होय ॥४१६॥ चौपाई छंद लिखे हमीर साहि सब १७ वंचे । करि मन कोप जंग कौं नंचे ॥ तीन सहस नीसाँन सु बज्जे । धर अंबर मग १८ सोर सुगज्जे ॥ ४१७॥ रणतभँवर चहुँ ओर सु घेरिव । दल न समात पुहमि सब हेरिव ॥ १ छाडू । २ राखि । ३ मुरौं, करौं अंत्यानुप्रास । ४ चल्लहि । ५ उग्गाहि । ६ आपु । ७ सुनो साखि यह साखि ध्रुव । ८ सुपन । ९ दीखंत । १० को । ११ नहीं । १२ धरनी । १३ धूरि । १४ अप्न । १५ मौति । १६ साको । १७ सो । १८ मधि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ७५ किन्न^१ निरोध क्रोध करि बुल्लिव । देखो कुबुधि हमीर सु मुझिव ॥ ४१८ ॥ जब हमीर हर मंदिर आए । बहु बिधि पूजि सु बचन सुनाए ॥ धूप दीप आरती उतारी । संकर की अस्तुति उच्चारी ॥ ४१९ ॥ नाराच छंद नमामि ईस संकरं, जटी पिनाकयं हरं । सिवं त्रिसूल^२ पाणियं, बिभुं प्रसुं सुजाणियं ॥ ४२० ॥ त्रिनैन अगि^३ भालयं, गलै^४ सु मुंडमालयं । भवानि^५ बाम भागयं, ललाट चंद्र लागयं ॥ ४२१ ॥ धरैं^६ सु सीस गंगयं, कपूर गौर अंगयं । सुवंग^७ संग फुंकरैं, सु नीलकंठ हुँकरैं ॥ ४२२ ॥ गणं गणेस सांबुयं, कि बीरभद्र जांबुयं । प्रसीद नाथ बेगयं, करो कृपा सु मे जयं ॥ ४२३ ॥ सहाय नाथ किज्जिए, अभै सुदाँन दिज्जिए । अलावदोन आययं, मलेच्छ^८ संग ल्याययं ॥ ४२४ ॥ सुलक्ख बीस सातयं, चढ़े सु कुप्पि^९ गातयं । प्रताप तेज आपकैं, मिटे कुकर्म्म पाप कै ॥ ४२५ ॥ सरन्न सेख आययं, करो सहाय पाययं । उमा सु नाथ नाथयं, गहो सु मोर हाथयं । छुटंत लाज गड्डयं, सरन्नगन्न द्रड्ढय^१० ॥ ४२६ ॥ १ कीन । २ त्रिलोक । ३ अग्नि । ४ गरै । ५ भवा सुबाम भागयं । ६ टरैं । ७ भवंग । ८ मलेच्छ बंस भाइयं । ९ कोपि । १० दिड्डयं ।
७६ हम्मीररासो दोहरा छंद सिव स्वरुप उर धारि कै, मूँदि१ नयन धरि ध्याँन । यह अस्तुति नृप की सुनी, भय प्रसन्न बरदाँन ॥ ४२७ ॥ कहैं संभु हम्मीर सुनि, कीरति जुग जुग तोर । चौदह वर्ष जु साहि सौं, लरत बिघ्न नहिं और ॥ ४२८ ॥ बारै अरु२ द्वै बरष परि, सुदि अषाढ़ सनि सोइ । एकादशी जु पुष्य कौ, साको पूरन होइ ॥ ४२६ ॥ यह साको अरु जस अमर, फबै तोहिं कलि माहिं । छत्री को जुग जुग धरम, यह समाँन कछु नाहिं ॥ ४३० ॥ हरष सहित३ हम्मीर तव, ईस चरण दिय सीस । तब मंदिर तैं निकसि कै, करी जुद्ध कौं रीस ॥ ४३१ ॥ संकर कह्यौ हमीर सौं, सुनहु राव ध्रुव साखि । सहस सूर तेरे जहाँ, परैं मलेच्छ सु लाख४ ॥ ४३२ ॥ चौपाई छंद राव हमीर दिवाँन कराए । मंत्री मित्र५ बंधु सब आए ॥ सूर बीर रावत भट६ बंके । स्वामि धर्म्म तन मन तिन हंके ॥ ४३३ ॥ काछ बाछ दृढ़ बज्र सरीरं । माया मोह न लोभ अधीरं७ ॥ अमृत बचन सबन तैं भक्खे८ । जाचत आपुन प्राँन९ न रक्खे१०॥ ४३४ ॥ नाना११ बिरद बंदि बिरदावैं । १ मुदि । २ बारा सै । ३ सहीत, सहित्त । ४ आखि । ५ मंत्र । ६ भड । ७ अभीरं । ८ भाखे । ६ जीव । १० राखे । ११ बाना । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ७७ लक्ख लक्ख १ कै पटा जु पावैं ॥ काको वीर राव रणधीरह । कर्यो जुहार राव हम्मीरह ॥ ४३५ ॥ आयस होय करव मैं सोई। देखो २ राव हाथ ३ मम जोई ॥ काकै कन्ह ४ करी जस आगे। कनवज कमध्वज सों रँग ५ पागै ॥ ४३६ ॥ कहै हमीर धीर सुनि बानी। तुम जु कहो सो मोहिं न छानी ॥ अब गढ़ कोट इसम पुर जेते । तुम रक्षक ६ हम जाँनत तेते ॥ ४३७ ॥ दोहरा छंद मैं पहलै पतिसाह सों, कही बात ७ करि टेक। सो अब चौरै ८ साहि सों, करौं जंग अब एक ॥ ४३८ ॥ त्रोटक छंद चढ़िए करि कोप हमीर मनं । करि दिड्ढ सगड्ढ सम्हारि पनं ॥ बहु तोप सुसिद्ध सँवारि ९ धरी। बुरजैं बुरजैं घर धूम परी ॥४३९॥ बहु कंगुर कंगुर बीर अरे । सब द्वारन द्वारन धीर १० परे ॥ सब ठौरन ठौरन राखि ११भरं । चढ़िए गजपै चहुवांन नरं ॥४४०॥ १ लाख लाख । २ देखहु । ३ हत्थ । ४ कहूँ । ५ रिस पागै । ६ रच्छक । ७ वत्त । ८ चौरह । ६ सँवार । १० बीर घरे । ११ रखि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
७८ हम्मीररासो बहु बीर हमीर सुसंग चढ़े । गजराजन उप्पर द्वंद बढ़े ॥ करि डंबर अंबर सीस लगे । मनु सोवत धीर सबीर जगे१ ॥४४१॥ बहु चंचल बाजि करत्त खुरी । तिन उप्पर पक्खर सोंज परी ॥ नर जाँन जवाँन लसैँ दल मैं । रन मैं उनमत्त लसैँ बल मैं२ ॥४४२॥ बहु दुंदुभि बज्जत३ घोर घनं । निकसे तब राव करन्न रनं ॥ बहु बारन बारन बीर कढ़े । गज बाजि सु सिंदन* जान चढ़े ॥४४३॥ लखि साह सनम्मुख कोप कियं । रणथंभ चहूँ दिसि घेर लियं ॥ मिलि राव हमीर सु साहि दलं । बिफरे बर बीर करंत हलं ॥४४४॥ सर छुट्टत फुट्टत पार गजं । सु मनौं अहि पच्छय४ मध्य रजं ॥ तरवारि बहैं कर पानि बलं । धर मध्य धरैं धर हक खलं५ ॥४४५॥ मुख अग्ग६ बढ़े रणधीर लरैं । तिनसों पतिसाह के बीर अरैं ॥ १ गजे । २ नर धीर मनं दरसैं बल मैं । ३ बाजत । ४ पन्नय । ५ घर सीस परैं सिरहाँक खलं । ६ अग्र । *सिंदन=स्यंदन, रथ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ७९ अजमंत १ महुम्मद इक अली । तिन संग असीसु सहस्स चली ॥४४६॥ तिहिं द्वंद अमंद बिलंद कियौ । रणधीर महा रण मेलि लियौ ॥ करि कोप तबै रणधीर मनं । वर बैन कहै पन धारि घनं ॥४४७॥ महिमंद २ अली मुख आय जुरचौ । दुहुँ बीर तहाँ तब जुद्ध करचौ ॥ अजमंत कमाँन लई कर मैं । रणधीर कै तीर कढ्यौ उर मैं ॥४४८॥ रणधीर सु कोपि कै साँगे लई । अजमंत कै फूटि ३ कै ४ पार गई ॥ परियौ अजमंत सु खेत जबै । महमंद अली फिरि आय ५ तबै ॥४४९॥ रणधीर सु कोपि कै बैन कहैं । कर देखि अचै मति भुल्लि ६ रहै ॥ किरवाँन सु धीर के अंग दई । कटि टोप कछू सिर माँझ ७ भई ॥४५०॥ तब कोप कियौ रणधीर मनं । किरवाँन दई महमंद तनं ॥ परियौ महमंद अमंद बली । तब साहि कि सैन सबै जु हली ॥४५१॥ लुथि ८ लुत्थि परैं बहु बीर अरैं । बहु खंजर पंजर पार करैं ॥ १ अजमत्ति । २ महमद्द । ३ फुटि । ४ रु । ५ आयौ । ६ भूलि । ७ माँहि । ८ जुथि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri