हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० हम्मीररासो दोहरा छंद पंच¹ सूर हम्मीर के, बीस सहस असवार² । उत सब दल पतिसाह को, बज्यौ परस्पर झार ॥३६१॥ नदी वना सज उप्परै, रत्ति³ बसिय पतिसाह । प्रात कुच्च४ नहिं करि सके, आय जुटे⁵ नरनाह ॥३६२॥ पद्धरी छंद . चढ़ि चले⁶ साह हरवल सभीर । तिहिं जुटे राव कूरम सबीर⁷ ॥ बघेल हरीसिंह अनिय वांधि । चंदे(दो)ल पयादे भिरिव संधि । ३९३॥ बिच गोल साह को जितो सुद्ध । तिन सूर राव कै करि⁸ न जुद्ध ॥ यहि भाँति पंच राउत अभंग । पतिसाह सेन सौँ जुटे जंग ॥ ३९४॥ कम्माँन स्रवन लगि करि कसीस । मनु प्रगट पन्थ भारत्थ सीस ॥ सर बरसत पावस मनो नीर । बहु बेधि कवच धर परत धीर ॥३९५॥ लगि सेल अंग नहिं पार होत । ससि कारि⁹ घटा मैं करि उदोत ॥ फिरवाँन बहैं करि करिव क्रोध । धर परत सीस धर उठत¹⁰ जोध ॥३६६॥ १ पाँच । २ अस्वार । ३ राति वसे । ४ कूँच । ५ जुटिय, जुटिग । ६ चलिय । ७ तहँ जुटिउ (जुटिग) राव कूरंम बीर । ८ करे । ९ कोरि । १० उठित, पुठत । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri