हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ७१ लगि होत कटारिय अंग पार। प्रासाद उच्च कै खुले द्वार ॥ बहु खंजर पंजर करत पार¹। ऊँची जु उठी सु तो रुहिर² धार ॥३९७॥ मनु पर्व्वत तैं, गेरू पनार। बहि³ चली⁴ अंग तैं सोन⁵ धार ॥ बहु घायल घुम्मत बहुत घाव। मनु केसिव⁶ किंसुक तरु सुहाव ॥३९८॥ चल परी साह दल मैं अपार। हा हंत सद⁷ औ दल मँझार ॥६९९॥ दोहरा छंद भगिय⁸ सेन पतिसाह की, लुटी जु रिद्धि अपार। तब मरहम खाँ साह सौं, अर्ज करी⁹ तिहिँ बार ॥४००॥ हजरति देस हमार को, निपट अटपटो जानि। भिल्ल कौल तस्कर सबै, और किरात सुमानि ॥४०१॥ सजग रहा निसि द्यौस सब, गाफलि रहो न मूर। हनिय सेन सब अपनिय¹⁰, तीस¹¹ हजार सपूर ॥४०२॥ घायल कौ लेखौ नहीं, हथ्थिय¹² परे सु बीस। परे बाजि सब ड्योढ़¹³ सत, सुनि जिय अचरिज दीस ॥४०३॥ परे राव कै बीर दस, घायल पंच पचीस। अभय¹⁴ सिंह पम्मार कै, भयौ घाव दस सोस ॥४०४॥ जाय जुहारे राव कौ, कही चमू की बात। तब हमीर सब तैं कही, बाहर लरो न तात ॥४०५॥ १ फार । २ रुधिर । ३ बहु । ४ चलिय । ५ रुधिर । ६ के सुव । ७ सब्द । ८ भगी । ६ करी अरज । १० आपनी । ११ तीन । १२ हाथी । १३ ड्योढ़ सौ । १४ अभय साहि पम्मार इक । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri