हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ हम्मीररासो छप्पय छंद तब सु साह करि कुच्च १, चले २ रणथंभहिं आए। सकल सु संकित हियैं ३, मीर उमराव सुभाए। जल थल पाधरि सैन ऐन ४ चहुँ ओर सु दिक्खिव। चढ़ि अगार इक उच्च ५ राव बहु भाँति न लक्खिव॥ चहुवाँन राव हड़ हड़ ६ हँस्यौ ७ हेरि सैन इम उच्चरचौ ८। पतसाह किधौं सोहा जुगर मानो एक टाँडो परचौ ९ ॥४०६॥ दोहरा छंद फिरि पतिसाह हमीर कौ, लिखि पठए १० फरमाँन। अजहूँ ११ हिंदू समुझ तुव, मिलि तजि सब अभिमाँन ॥ ०७॥ छप्पय छंद मैं मक्के १२ को पीर दिली पतिसाह कहाऊँ। हिंदू तुरक दुराह १३ सबै इक सार चलाऊँ॥ बीर च्यारि अरु पीर रहें मुझ पर १४ चौरासी। महिमा साहि न रक्खि राव मति करै जु हाँसी। १५ तुम समुझि सोचि १६ जिय अप्पनै १७ कहा तोहिं फल ऊपजै। परचँड लाय उठठे जु सिर इक १८ सेख कौ नहिं तजै ॥४०८॥ फिर हमीर फरमाँन साहि कौं उलटि पठायौ। हजरति छत्री धर्म्म सुन्यौ नहिं स्रवनन गायौ॥ तुम मक्के कै पीर सूर सुरलोक कहाऊँ। तुम सरभर नहिं हसम साहि पल मैं १९ जु नसाऊँ॥ १ कूँच। २ दुग्ग। ३ हीय। ४ एन। ५ ऊँच। ६ हर,हर। ७ हँसिव। ८ उच्चरिव। ९ परिव। १० मेजिय। ११ अवहूँ। १२ मक्का का। १३ दाउ राह। १४ पै। १५ महिमा साहि हमीर राखि मति करै जु हाँसी। १६ देखि। १७ आपनै। १८ एक। १६ माँझ। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri