हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ हम्मीररासो दोहरा छंद सिव स्वरुप उर धारि कै, मूँदि१ नयन धरि ध्याँन । यह अस्तुति नृप की सुनी, भय प्रसन्न बरदाँन ॥ ४२७ ॥ कहैं संभु हम्मीर सुनि, कीरति जुग जुग तोर । चौदह वर्ष जु साहि सौं, लरत बिघ्न नहिं और ॥ ४२८ ॥ बारै अरु२ द्वै बरष परि, सुदि अषाढ़ सनि सोइ । एकादशी जु पुष्य कौ, साको पूरन होइ ॥ ४२६ ॥ यह साको अरु जस अमर, फबै तोहिं कलि माहिं । छत्री को जुग जुग धरम, यह समाँन कछु नाहिं ॥ ४३० ॥ हरष सहित३ हम्मीर तव, ईस चरण दिय सीस । तब मंदिर तैं निकसि कै, करी जुद्ध कौं रीस ॥ ४३१ ॥ संकर कह्यौ हमीर सौं, सुनहु राव ध्रुव साखि । सहस सूर तेरे जहाँ, परैं मलेच्छ सु लाख४ ॥ ४३२ ॥ चौपाई छंद राव हमीर दिवाँन कराए । मंत्री मित्र५ बंधु सब आए ॥ सूर बीर रावत भट६ बंके । स्वामि धर्म्म तन मन तिन हंके ॥ ४३३ ॥ काछ बाछ दृढ़ बज्र सरीरं । माया मोह न लोभ अधीरं७ ॥ अमृत बचन सबन तैं भक्खे८ । जाचत आपुन प्राँन९ न रक्खे१०॥ ४३४ ॥ नाना११ बिरद बंदि बिरदावैं । १ मुदि । २ बारा सै । ३ सहीत, सहित्त । ४ आखि । ५ मंत्र । ६ भड । ७ अभीरं । ८ भाखे । ६ जीव । १० राखे । ११ बाना । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri