हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ७७ लक्ख लक्ख १ कै पटा जु पावैं ॥ काको वीर राव रणधीरह । कर्यो जुहार राव हम्मीरह ॥ ४३५ ॥ आयस होय करव मैं सोई। देखो २ राव हाथ ३ मम जोई ॥ काकै कन्ह ४ करी जस आगे। कनवज कमध्वज सों रँग ५ पागै ॥ ४३६ ॥ कहै हमीर धीर सुनि बानी। तुम जु कहो सो मोहिं न छानी ॥ अब गढ़ कोट इसम पुर जेते । तुम रक्षक ६ हम जाँनत तेते ॥ ४३७ ॥ दोहरा छंद मैं पहलै पतिसाह सों, कही बात ७ करि टेक। सो अब चौरै ८ साहि सों, करौं जंग अब एक ॥ ४३८ ॥ त्रोटक छंद चढ़िए करि कोप हमीर मनं । करि दिड्ढ सगड्ढ सम्हारि पनं ॥ बहु तोप सुसिद्ध सँवारि ९ धरी। बुरजैं बुरजैं घर धूम परी ॥४३९॥ बहु कंगुर कंगुर बीर अरे । सब द्वारन द्वारन धीर १० परे ॥ सब ठौरन ठौरन राखि ११भरं । चढ़िए गजपै चहुवांन नरं ॥४४०॥ १ लाख लाख । २ देखहु । ३ हत्थ । ४ कहूँ । ५ रिस पागै । ६ रच्छक । ७ वत्त । ८ चौरह । ६ सँवार । १० बीर घरे । ११ रखि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri