हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ हम्मीररासो बहु बीर हमीर सुसंग चढ़े । गजराजन उप्पर द्वंद बढ़े ॥ करि डंबर अंबर सीस लगे । मनु सोवत धीर सबीर जगे१ ॥४४१॥ बहु चंचल बाजि करत्त खुरी । तिन उप्पर पक्खर सोंज परी ॥ नर जाँन जवाँन लसैँ दल मैं । रन मैं उनमत्त लसैँ बल मैं२ ॥४४२॥ बहु दुंदुभि बज्जत३ घोर घनं । निकसे तब राव करन्न रनं ॥ बहु बारन बारन बीर कढ़े । गज बाजि सु सिंदन* जान चढ़े ॥४४३॥ लखि साह सनम्मुख कोप कियं । रणथंभ चहूँ दिसि घेर लियं ॥ मिलि राव हमीर सु साहि दलं । बिफरे बर बीर करंत हलं ॥४४४॥ सर छुट्टत फुट्टत पार गजं । सु मनौं अहि पच्छय४ मध्य रजं ॥ तरवारि बहैं कर पानि बलं । धर मध्य धरैं धर हक खलं५ ॥४४५॥ मुख अग्ग६ बढ़े रणधीर लरैं । तिनसों पतिसाह के बीर अरैं ॥ १ गजे । २ नर धीर मनं दरसैं बल मैं । ३ बाजत । ४ पन्नय । ५ घर सीस परैं सिरहाँक खलं । ६ अग्र । *सिंदन=स्यंदन, रथ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri