हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ - हम्मीररासो - छंडूहूँ १ नटेकयह बिरद मम सेख रक्खि २ जंगहिं करयौ ३ ।४१२। तजै सेस जो भुम्मि मेरु चल्लै ४ घर उप्पर। उलटि गंग बह नीर सूर उग्गै ५ पच्छिम भर॥ ध्रुव चल्लै आकास समद मरजाद सुछंडै। सतीसंग पति कढै बहुरि घर आय ६ सुमंडै॥ थिर रह्यौ न यह संसार कोइ सुनो साहि साखी सु ध्रुव ७। दसकंध धरणि अज्जुन जिसा स्वप्नहिं ८ सम दिखंत ९ मुव ॥४१३॥ दोहरा छंद कलि मैं अमर जु कोइ १० नहिँ ११, इसम देखि नहिं भूल । तुम से किते अलावदी, या धरती १२ पर धूलि १३ ॥४१४॥ अपने कौ सूर न गिने, कायर गिनै न और । अपनी कीरति आप १४ मुख, यह कहबौ नहिं जोर ॥४१५॥ लिखे लेख करतार कै, हजरति मेट १५ न कोय । को जाणै रणथंभ गढ़, अब यह कैसो १६ होय ॥४१६॥ चौपाई छंद लिखे हमीर साहि सब १७ वंचे । करि मन कोप जंग कौं नंचे ॥ तीन सहस नीसाँन सु बज्जे । धर अंबर मग १८ सोर सुगज्जे ॥ ४१७॥ रणतभँवर चहुँ ओर सु घेरिव । दल न समात पुहमि सब हेरिव ॥ १ छाडू । २ राखि । ३ मुरौं, करौं अंत्यानुप्रास । ४ चल्लहि । ५ उग्गाहि । ६ आपु । ७ सुनो साखि यह साखि ध्रुव । ८ सुपन । ९ दीखंत । १० को । ११ नहीं । १२ धरनी । १३ धूरि । १४ अप्न । १५ मौति । १६ साको । १७ सो । १८ मधि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri