हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ६७ मनो छाड़ि१ बेला समुद्दं उमंडे किये२ हैं दलं पयदल रत्थ तंडे ॥३७४॥ चढ़े सत्त लक्खं सु हिंदू सयन्नं । सबौ बीस लक्खं मलेच्छं३ अयन्नं ॥ तहाँ डाक्र४ एकं सहस्सं दुपंचं । चले बेलदारं लखं कयारि संचं ॥३७५॥ चले एक५ लक्खं सु अगं६ सु सालं । अलीखाँन 'हम्मत्ति दाऊ हरोलं ॥ चले बाणियाँ संग व्यापार भारी। सु तो दोय लक्ख गिणौ संग सारी ॥३७६॥ चली लक्ख च्यार सु सग भियारी । पकावैं भुताँन 'खवै काँमचारी ॥ खर० गोखरू यों चले दोय लक्खं । फिरै कयारि लक्ख गसत्ती सु रक्खं ॥३७७॥ दुआगीर इक्कं सुलक्ख सुचल्ले : सु ता लंगरं सो सदा खाँन मिल्ले ॥ अरठब्बी लखं दोइ चल्ले सु संगं । रहे तोपखाने सदा जंग जंगं ॥३७८॥ भरे ऊँट वारूढ़ डेरा सुभारी । सु तो तीन लक्खं सजे संग सारी ॥ चले सहस पंचं मतंगं सु गज्जं । मनो पावसं मेघमाला सु रज्जं ॥३७९॥ लसैं बैरखं सो मनौं विज्ज १० भारी । १ छंडि । २ कियं, किते । ३ सुमिच्छं । ४ तहाँ पै कड़ाकं । ५ इक । ६ अग्रं । ७ गोखरं गोरसंगी । ८ गश्ती । ६ एकं । १० बीज ।