हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ हम्मीररासो जाति राव हम्भीर तोरि गढ़ धूरि मिलाऊँ । इती जो न अब करूँ१ तौ न पतसाह२ कहाऊँ ॥ केतोक राज३ रणथंभ को इतो कियो अभिमाँन तिहिं । कोपि४ साह भेजे जबै दसौं देस फर्मान जिहिं ॥३६३॥ सुने दूत के बचन साह जिय संका आय। चढ़ौ कोपि बिन समुझिवहाँ कैसी बनि जाइयं ।। हार५ जीति रब हाथि६ आप संमत जग होई । तातैं मंत्री मित्र मंत्र७ दृढ़ किज्जिय८ सोई ।। यह जानि साह दीवाँन किय खाँन बहत्तरि इक्क९ हुव। यह हठ हमीर को सुन्यौ तब रक्खे सेख सरन्न भुब ॥३६४। आँम खास उमराब सबै पतिसाह बुलाए। राजा राणा राव खाँन सुलताँन सु आए ॥ हठ हमीर 'मुझि करिव सेख सरनै निज रक्ख्यौ । दियौ दूत कौ ज्व ब बचन बहु अनबन भक्ख्यौ ।। सब तंत मंत जानो सु तुम देस काल बुधि इष्ट ध्रुव । जिहिं जाहु१० जाहुजस बुद्धि ह्वै कहो११ 'नित्ति'१२ उत्तम सु भुवा। ३६५॥ कहैं सकल उमराव ईस तुम सम नहिं कोई । तेज प्रतापउरु बुद्धि और दूजो नहिं कोई१३ ॥ फिर फिर जो फरमाँन राव कौ कहा जु लिख्वय । जो उपजै यहि बार सोइ प्रभु आपनु अख्विय१४ ॥ चढ़िए सिकार गीदड़ तणी तऊ सिंह के बाँधि१५ सर । १ हरौं । २ मैं साह । ३ राव । ४ कुप्पि साह पठाए जबै देस देस फुरमाँन जिहिं । ५ हारजिंति । ६ हत्थ । ७ पूँछि । ८ कीजे । ६ एक । १० जाहि जाहि । ११ कहा । १२ नीति । १३ साहि तुम जानत साई ( नहिं होई ) । १४ करिय प्रभु अप्पन अख्खिय, लिखिए, अखिए अंत्यानुप्रास । १५ वधि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri