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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

६६ हम्मीररासो तजे खेत जस १ जाय, बहुरि कछु हाथि न आवै ॥ खूती सरन हमीर कै, रह्यौ दीन जानै दोऊ । किज्जे मुहिम्म नहिं रात्र पै, या मैं तो सुख है सोऊ ॥३७०॥ मिस्र देस खंधार. खरे २ गज्जिनि ३ दल आये । अरु काबुल खुरसाँन, कोपि पतिसाह बुलाये ॥ रूम स्याँम कसमीर, और मुलताँन सु सज्जै । ईराँ तूराँ कटक, वलक आरब धर गज्जै ४ ॥ सब ५ देस रुहंग फिरंग कै, भबखड़ कै सज्जै सुबल । अल्लावदीन पतिसाह कै, चढ़े संग टिड्डी सु दल ॥३७१॥ चढ़े हिंद कै देस, प्रथम सोगठ गिरनारी । दच्छण ६ पूरव देस, लए दल बहल ७ भारी । अरु पहार कै भूप, और पच्छिम कै जानो । दसौं दिसा कै बीर, कहा कोड नाम बखानो ॥ ग्यारा सै अठतीस ८ ये, चैत्र मास द्वितिया प्रगट । चढ़े सुसाह अल्लावदी, कर हमीर पर कटक भट ॥३७२॥

  • भुजंगप्रयात छंद चढ़े साहि कोपे ९ सु बज्जे निसाँनं । चढ़े मीर गंभीर सथ्य १० सुजाँनं ॥ उड़ी रेणु आकास सुझै ११ न भाँनं । धरा मेरु डुल्लै सु भुल्लै दिसाँनं । ३७३॥ सहै सेस भारं न १२ पारं न पावै । डगै कौल दिग्गज १३ अग्गै सुधावै ॥ १ सच । २ खड़े । ३ गजनी, गजनि । ४ ईरान त्वैर औ बलख ठठा ( ठट्ट ) भष्पर से गज्जे । ५ सब देस रुहैलरु फिरँग रूम झगड़ा कै सज्जै सुबल । ६ दक्खिन । ७ बल अति । ८ अटिसिये । ६ कोपं । १० सत्थै । ११ सूझै न नैनं । १२ सम्हारं न पावै । १३ दिग्गं सु अग्गै । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ६७ मनो छाड़ि१ बेला समुद्दं उमंडे किये२ हैं दलं पयदल रत्थ तंडे ॥३७४॥ चढ़े सत्त लक्खं सु हिंदू सयन्नं । सबौ बीस लक्खं मलेच्छं३ अयन्नं ॥ तहाँ डाक्र४ एकं सहस्सं दुपंचं । चले बेलदारं लखं कयारि संचं ॥३७५॥ चले एक५ लक्खं सु अगं६ सु सालं । अलीखाँन 'हम्मत्ति दाऊ हरोलं ॥ चले बाणियाँ संग व्यापार भारी। सु तो दोय लक्ख गिणौ संग सारी ॥३७६॥ चली लक्ख च्यार सु सग भियारी । पकावैं भुताँन 'खवै काँमचारी ॥ खर० गोखरू यों चले दोय लक्खं । फिरै कयारि लक्ख गसत्ती सु रक्खं ॥३७७॥ दुआगीर इक्कं सुलक्ख सुचल्ले : सु ता लंगरं सो सदा खाँन मिल्ले ॥ अरठब्बी लखं दोइ चल्ले सु संगं । रहे तोपखाने सदा जंग जंगं ॥३७८॥ भरे ऊँट वारूढ़ डेरा सुभारी । सु तो तीन लक्खं सजे संग सारी ॥ चले सहस पंचं मतंगं सु गज्जं । मनो पावसं मेघमाला सु रज्जं ॥३७९॥ लसैं बैरखं सो मनौं विज्ज १० भारी । १ छंडि । २ कियं, किते । ३ सुमिच्छं । ४ तहाँ पै कड़ाकं । ५ इक । ६ अग्रं । ७ गोखरं गोरसंगी । ८ गश्ती । ६ एकं । १० बीज ।

६८ हम्मीररासो बरै दाँन वर्षा मनो भुम्मि १ कारी ॥ लसै उज्ज्वलं दंत बग पंक्ति मानो । इती साह की सेन सब्जी सुजानो ॥३८०॥ गर्जत निसाँनं सु सज्जंत भानो । मनूँ पावसं मेघ गज्जैं सु मानो २ ॥ सबै सेन सज्जी चढ्यौ साहि कोपं । सबै पंच ३ चालीस लक्खं सु ओपं ॥३८१॥ तहाँ तीस ४ हुज्जार निस्साँन ५ बज्जैं । सु तो घोर सोरं सुने मेघ लज्जैं ॥ सताईस लक्खं महाबीर बंके । टरै नाहिं जंगं भए ताँम हंके ।३८२॥ परै ६ जोजनं अठ्ठ ७ औ दोय फौजं । कटे वंक वनं हटे नाहिं रोजं ॥ चढ़ं उव्वटं बाट थट्टे ८ सु चल्ले । मनो सायर ९ छंडिं १० बेला उगल्ले ॥३८३॥ जले सुक्कियं ११ नीर नाना सुथाँनं । बहैं औघट घाट दुट्टंत १२ माँनं ॥ कियौ कूच कूचं १३ चले मीर धीरं । परच्यौ जोर हम्मीर कै देस तीरं ॥३८४॥ भजे भुम्मियाँ भुम्मि चल्लं अपारं । गए पब्वंतं १४ बंक मैवास * भारं ॥ १ भूमि । २ भानो, जानो । ३ पाँच । ४ तीन । ५ नीसाँन । ६ परी । ७ आठ । ८ थारे । ६ सायरं । १० छाँडि । ११ सोखियं । १२ टूटंत । १३ कुच्च कुच्चं । १४ पव्यतं, पव्ययं । *मैवास ( मेवासा )=क़िला । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ६९ सबै राव हम्मीर कै देस माहीं । भए बीर संघीर जुद्धं समाहीं ॥३८५॥ तिहाँ¹बीचि मलहारणी इक्क² गढ़ढं । लरे राव कै रावतं जोर दड्ढं ॥ दिना तीन लौं सो कियौ जुद्ध भारी । फते³पातसा की भई बैनकारी ४ ॥३८६॥ चले अग्र ५ साहं सु सेना हँकारी । सुनी राव हम्मीर कुप्पे ६ सु भारी ॥ किये रक्त नैनं भृकुटी ७ क्रूरुं । लख्यौ रावतं जोर उट्ठे जरूरं ॥३८७॥ परी पक्खरं वाजि राजं सु सज्जे ८ । बजे नद्द निस्साँन ९ आकास लज्जे १० ॥ तबै राव हम्मीर कौ सीस नाए । बिना आयुसं साह पै बीर धाए ॥३८८॥ जुरे आय जुद्धं न दीजौ बनासं । चढ़े लक्ख चालीस औ पाँच तासं ॥ इतै राव हम्मीर कै पंच ११ सूरं । अभयसिंह पम्मार रठ्ठोर भूरं ॥३८६॥ हरीसिंह बघेल कूरम्म भीरं । चहूवाँन सद्दूल १२ अजमत्त सीमं ॥ त्रिभागै करी सेन बागैं उठाई । मिले बीर धीरं अमोरं हटाई ॥३९०॥ १ तहीं बिच्चि । २ एक । ३ भते । ४ बनकारी ( बन्नकारी ) । ५ अग्र । ६ कोपे । ७ भकुट्टी । ८ साजे । ६ नीसाँन । १० लाजे । ११ पाँच । १२ सार्दूल । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

७० हम्मीररासो दोहरा छंद पंच¹ सूर हम्मीर के, बीस सहस असवार² । उत सब दल पतिसाह को, बज्यौ परस्पर झार ॥३६१॥ नदी वना सज उप्परै, रत्ति³ बसिय पतिसाह । प्रात कुच्च४ नहिं करि सके, आय जुटे⁵ नरनाह ॥३६२॥ पद्धरी छंद . चढ़ि चले⁶ साह हरवल सभीर । तिहिं जुटे राव कूरम सबीर⁷ ॥ बघेल हरीसिंह अनिय वांधि । चंदे(दो)ल पयादे भिरिव संधि । ३९३॥ बिच गोल साह को जितो सुद्ध । तिन सूर राव कै करि⁸ न जुद्ध ॥ यहि भाँति पंच राउत अभंग । पतिसाह सेन सौँ जुटे जंग ॥ ३९४॥ कम्माँन स्रवन लगि करि कसीस । मनु प्रगट पन्थ भारत्थ सीस ॥ सर बरसत पावस मनो नीर । बहु बेधि कवच धर परत धीर ॥३९५॥ लगि सेल अंग नहिं पार होत । ससि कारि⁹ घटा मैं करि उदोत ॥ फिरवाँन बहैं करि करिव क्रोध । धर परत सीस धर उठत¹⁰ जोध ॥३६६॥ १ पाँच । २ अस्वार । ३ राति वसे । ४ कूँच । ५ जुटिय, जुटिग । ६ चलिय । ७ तहँ जुटिउ (जुटिग) राव कूरंम बीर । ८ करे । ९ कोरि । १० उठित, पुठत । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ७१ लगि होत कटारिय अंग पार। प्रासाद उच्च कै खुले द्वार ॥ बहु खंजर पंजर करत पार¹। ऊँची जु उठी सु तो रुहिर² धार ॥३९७॥ मनु पर्व्वत तैं, गेरू पनार। बहि³ चली⁴ अंग तैं सोन⁵ धार ॥ बहु घायल घुम्मत बहुत घाव। मनु केसिव⁶ किंसुक तरु सुहाव ॥३९८॥ चल परी साह दल मैं अपार। हा हंत सद⁷ औ दल मँझार ॥६९९॥ दोहरा छंद भगिय⁸ सेन पतिसाह की, लुटी जु रिद्धि अपार। तब मरहम खाँ साह सौं, अर्ज करी⁹ तिहिँ बार ॥४००॥ हजरति देस हमार को, निपट अटपटो जानि। भिल्ल कौल तस्कर सबै, और किरात सुमानि ॥४०१॥ सजग रहा निसि द्यौस सब, गाफलि रहो न मूर। हनिय सेन सब अपनिय¹⁰, तीस¹¹ हजार सपूर ॥४०२॥ घायल कौ लेखौ नहीं, हथ्थिय¹² परे सु बीस। परे बाजि सब ड्योढ़¹³ सत, सुनि जिय अचरिज दीस ॥४०३॥ परे राव कै बीर दस, घायल पंच पचीस। अभय¹⁴ सिंह पम्मार कै, भयौ घाव दस सोस ॥४०४॥ जाय जुहारे राव कौ, कही चमू की बात। तब हमीर सब तैं कही, बाहर लरो न तात ॥४०५॥ १ फार । २ रुधिर । ३ बहु । ४ चलिय । ५ रुधिर । ६ के सुव । ७ सब्द । ८ भगी । ६ करी अरज । १० आपनी । ११ तीन । १२ हाथी । १३ ड्योढ़ सौ । १४ अभय साहि पम्मार इक । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

७२ हम्मीररासो छप्पय छंद तब सु साह करि कुच्च १, चले २ रणथंभहिं आए। सकल सु संकित हियैं ३, मीर उमराव सुभाए। जल थल पाधरि सैन ऐन ४ चहुँ ओर सु दिक्खिव। चढ़ि अगार इक उच्च ५ राव बहु भाँति न लक्खिव॥ चहुवाँन राव हड़ हड़ ६ हँस्यौ ७ हेरि सैन इम उच्चरचौ ८। पतसाह किधौं सोहा जुगर मानो एक टाँडो परचौ ९ ॥४०६॥ दोहरा छंद फिरि पतिसाह हमीर कौ, लिखि पठए १० फरमाँन। अजहूँ ११ हिंदू समुझ तुव, मिलि तजि सब अभिमाँन ॥ ०७॥ छप्पय छंद मैं मक्के १२ को पीर दिली पतिसाह कहाऊँ। हिंदू तुरक दुराह १३ सबै इक सार चलाऊँ॥ बीर च्यारि अरु पीर रहें मुझ पर १४ चौरासी। महिमा साहि न रक्खि राव मति करै जु हाँसी। १५ तुम समुझि सोचि १६ जिय अप्पनै १७ कहा तोहिं फल ऊपजै। परचँड लाय उठठे जु सिर इक १८ सेख कौ नहिं तजै ॥४०८॥ फिर हमीर फरमाँन साहि कौं उलटि पठायौ। हजरति छत्री धर्म्म सुन्यौ नहिं स्रवनन गायौ॥ तुम मक्के कै पीर सूर सुरलोक कहाऊँ। तुम सरभर नहिं हसम साहि पल मैं १९ जु नसाऊँ॥ १ कूँच। २ दुग्ग। ३ हीय। ४ एन। ५ ऊँच। ६ हर,हर। ७ हँसिव। ८ उच्चरिव। ९ परिव। १० मेजिय। ११ अवहूँ। १२ मक्का का। १३ दाउ राह। १४ पै। १५ महिमा साहि हमीर राखि मति करै जु हाँसी। १६ देखि। १७ आपनै। १८ एक। १६ माँझ। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ७३ नहिं तजौं टेक छोड़ूँ१ न पन यह बिचार निहचै२ घरचौ३। छिन भंग अंग लालच कहा सुजस खोय जीवन करचौ४ ॥४०९॥ दोहरा छंद जैत छाँडि जोगी कहा, सत छँडै५ रजपूत। सेख न सौंपौं साह कौं, जव६ लग सिर साबूत ॥४१०॥ छप्पय छंद हजरति नई न करूँ करूँ जैसी७ चलि आई। मुसलमाँन चहुवाँन सदा ऐसी८ वनि आई॥ ख्वाजे मीराँ पीर खेत अजमेरि खिसाए।* असी सहस इक लक्ख बहुरि९ मक्का न दिखाए१० ॥ बीसल दे अजमेर गढ़ सो न्रगरा साकौ कियव। नन बरीय सुंदरी कुँवरि सो साह बहुत लालच दियव ॥४११॥ प्रथीराज वर सात साहि गवरी गहि छंड्यौ। कर चूरी पहिराय दंड करि कछुव न मंड्यौ ॥ ता पिच्छै गढ़ दिल्ली साहि गौरी चढ़ि११ आयव१२। रेण१३ कुमार अपार जुद्ध करि सुर पुर धायव१४॥ चहुवाँन बंस अवतंस जो खग्ग१५ त्यागि नाहिंन मुरचौ१६। १ त्यागूँ। २ निश्चय। ३ धरिब ४ करिव। ५ छाँड़ै। ६ जौलौं। ७ ऐसी। ८ तैसे। ९ उलटि। १० खिंदाए। ११ चलि। १२ आए। १३ रमण। १४ धाए। १५ खाग। १६ मुरयय।

  • असुर मारि अजपाल चहूँ दिपि चक्र चलाए। बीसल दे अजमेरि पाय मँडलीक लगाए॥ चीरम दे जालोर गढ़ सो नगरै साकौ कियव। नन बरी जीभ सुंदरि कुँवरि साहच होत... ॥ १० CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

७४ - हम्मीररासो - छंडूहूँ १ नटेकयह बिरद मम सेख रक्खि २ जंगहिं करयौ ३ ।४१२। तजै सेस जो भुम्मि मेरु चल्लै ४ घर उप्पर। उलटि गंग बह नीर सूर उग्गै ५ पच्छिम भर॥ ध्रुव चल्लै आकास समद मरजाद सुछंडै। सतीसंग पति कढै बहुरि घर आय ६ सुमंडै॥ थिर रह्यौ न यह संसार कोइ सुनो साहि साखी सु ध्रुव ७। दसकंध धरणि अज्जुन जिसा स्वप्नहिं ८ सम दिखंत ९ मुव ॥४१३॥ दोहरा छंद कलि मैं अमर जु कोइ १० नहिँ ११, इसम देखि नहिं भूल । तुम से किते अलावदी, या धरती १२ पर धूलि १३ ॥४१४॥ अपने कौ सूर न गिने, कायर गिनै न और । अपनी कीरति आप १४ मुख, यह कहबौ नहिं जोर ॥४१५॥ लिखे लेख करतार कै, हजरति मेट १५ न कोय । को जाणै रणथंभ गढ़, अब यह कैसो १६ होय ॥४१६॥ चौपाई छंद लिखे हमीर साहि सब १७ वंचे । करि मन कोप जंग कौं नंचे ॥ तीन सहस नीसाँन सु बज्जे । धर अंबर मग १८ सोर सुगज्जे ॥ ४१७॥ रणतभँवर चहुँ ओर सु घेरिव । दल न समात पुहमि सब हेरिव ॥ १ छाडू । २ राखि । ३ मुरौं, करौं अंत्यानुप्रास । ४ चल्लहि । ५ उग्गाहि । ६ आपु । ७ सुनो साखि यह साखि ध्रुव । ८ सुपन । ९ दीखंत । १० को । ११ नहीं । १२ धरनी । १३ धूरि । १४ अप्न । १५ मौति । १६ साको । १७ सो । १८ मधि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ७५ किन्न^१ निरोध क्रोध करि बुल्लिव । देखो कुबुधि हमीर सु मुझिव ॥ ४१८ ॥ जब हमीर हर मंदिर आए । बहु बिधि पूजि सु बचन सुनाए ॥ धूप दीप आरती उतारी । संकर की अस्तुति उच्चारी ॥ ४१९ ॥ नाराच छंद नमामि ईस संकरं, जटी पिनाकयं हरं । सिवं त्रिसूल^२ पाणियं, बिभुं प्रसुं सुजाणियं ॥ ४२० ॥ त्रिनैन अगि^३ भालयं, गलै^४ सु मुंडमालयं । भवानि^५ बाम भागयं, ललाट चंद्र लागयं ॥ ४२१ ॥ धरैं^६ सु सीस गंगयं, कपूर गौर अंगयं । सुवंग^७ संग फुंकरैं, सु नीलकंठ हुँकरैं ॥ ४२२ ॥ गणं गणेस सांबुयं, कि बीरभद्र जांबुयं । प्रसीद नाथ बेगयं, करो कृपा सु मे जयं ॥ ४२३ ॥ सहाय नाथ किज्जिए, अभै सुदाँन दिज्जिए । अलावदोन आययं, मलेच्छ^८ संग ल्याययं ॥ ४२४ ॥ सुलक्ख बीस सातयं, चढ़े सु कुप्पि^९ गातयं । प्रताप तेज आपकैं, मिटे कुकर्म्म पाप कै ॥ ४२५ ॥ सरन्न सेख आययं, करो सहाय पाययं । उमा सु नाथ नाथयं, गहो सु मोर हाथयं । छुटंत लाज गड्डयं, सरन्नगन्न द्रड्ढय^१० ॥ ४२६ ॥ १ कीन । २ त्रिलोक । ३ अग्नि । ४ गरै । ५ भवा सुबाम भागयं । ६ टरैं । ७ भवंग । ८ मलेच्छ बंस भाइयं । ९ कोपि । १० दिड्डयं ।

७६ हम्मीररासो दोहरा छंद सिव स्वरुप उर धारि कै, मूँदि१ नयन धरि ध्याँन । यह अस्तुति नृप की सुनी, भय प्रसन्न बरदाँन ॥ ४२७ ॥ कहैं संभु हम्मीर सुनि, कीरति जुग जुग तोर । चौदह वर्ष जु साहि सौं, लरत बिघ्न नहिं और ॥ ४२८ ॥ बारै अरु२ द्वै बरष परि, सुदि अषाढ़ सनि सोइ । एकादशी जु पुष्य कौ, साको पूरन होइ ॥ ४२६ ॥ यह साको अरु जस अमर, फबै तोहिं कलि माहिं । छत्री को जुग जुग धरम, यह समाँन कछु नाहिं ॥ ४३० ॥ हरष सहित३ हम्मीर तव, ईस चरण दिय सीस । तब मंदिर तैं निकसि कै, करी जुद्ध कौं रीस ॥ ४३१ ॥ संकर कह्यौ हमीर सौं, सुनहु राव ध्रुव साखि । सहस सूर तेरे जहाँ, परैं मलेच्छ सु लाख४ ॥ ४३२ ॥ चौपाई छंद राव हमीर दिवाँन कराए । मंत्री मित्र५ बंधु सब आए ॥ सूर बीर रावत भट६ बंके । स्वामि धर्म्म तन मन तिन हंके ॥ ४३३ ॥ काछ बाछ दृढ़ बज्र सरीरं । माया मोह न लोभ अधीरं७ ॥ अमृत बचन सबन तैं भक्खे८ । जाचत आपुन प्राँन९ न रक्खे१०॥ ४३४ ॥ नाना११ बिरद बंदि बिरदावैं । १ मुदि । २ बारा सै । ३ सहीत, सहित्त । ४ आखि । ५ मंत्र । ६ भड । ७ अभीरं । ८ भाखे । ६ जीव । १० राखे । ११ बाना । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ७७ लक्ख लक्ख १ कै पटा जु पावैं ॥ काको वीर राव रणधीरह । कर्यो जुहार राव हम्मीरह ॥ ४३५ ॥ आयस होय करव मैं सोई। देखो २ राव हाथ ३ मम जोई ॥ काकै कन्ह ४ करी जस आगे। कनवज कमध्वज सों रँग ५ पागै ॥ ४३६ ॥ कहै हमीर धीर सुनि बानी। तुम जु कहो सो मोहिं न छानी ॥ अब गढ़ कोट इसम पुर जेते । तुम रक्षक ६ हम जाँनत तेते ॥ ४३७ ॥ दोहरा छंद मैं पहलै पतिसाह सों, कही बात ७ करि टेक। सो अब चौरै ८ साहि सों, करौं जंग अब एक ॥ ४३८ ॥ त्रोटक छंद चढ़िए करि कोप हमीर मनं । करि दिड्ढ सगड्ढ सम्हारि पनं ॥ बहु तोप सुसिद्ध सँवारि ९ धरी। बुरजैं बुरजैं घर धूम परी ॥४३९॥ बहु कंगुर कंगुर बीर अरे । सब द्वारन द्वारन धीर १० परे ॥ सब ठौरन ठौरन राखि ११भरं । चढ़िए गजपै चहुवांन नरं ॥४४०॥ १ लाख लाख । २ देखहु । ३ हत्थ । ४ कहूँ । ५ रिस पागै । ६ रच्छक । ७ वत्त । ८ चौरह । ६ सँवार । १० बीर घरे । ११ रखि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

७८ हम्मीररासो बहु बीर हमीर सुसंग चढ़े । गजराजन उप्पर द्वंद बढ़े ॥ करि डंबर अंबर सीस लगे । मनु सोवत धीर सबीर जगे१ ॥४४१॥ बहु चंचल बाजि करत्त खुरी । तिन उप्पर पक्खर सोंज परी ॥ नर जाँन जवाँन लसैँ दल मैं । रन मैं उनमत्त लसैँ बल मैं२ ॥४४२॥ बहु दुंदुभि बज्जत३ घोर घनं । निकसे तब राव करन्न रनं ॥ बहु बारन बारन बीर कढ़े । गज बाजि सु सिंदन* जान चढ़े ॥४४३॥ लखि साह सनम्मुख कोप कियं । रणथंभ चहूँ दिसि घेर लियं ॥ मिलि राव हमीर सु साहि दलं । बिफरे बर बीर करंत हलं ॥४४४॥ सर छुट्टत फुट्टत पार गजं । सु मनौं अहि पच्छय४ मध्य रजं ॥ तरवारि बहैं कर पानि बलं । धर मध्य धरैं धर हक खलं५ ॥४४५॥ मुख अग्ग६ बढ़े रणधीर लरैं । तिनसों पतिसाह के बीर अरैं ॥ १ गजे । २ नर धीर मनं दरसैं बल मैं । ३ बाजत । ४ पन्नय । ५ घर सीस परैं सिरहाँक खलं । ६ अग्र । *सिंदन=स्यंदन, रथ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ७९ अजमंत १ महुम्मद इक अली । तिन संग असीसु सहस्स चली ॥४४६॥ तिहिं द्वंद अमंद बिलंद कियौ । रणधीर महा रण मेलि लियौ ॥ करि कोप तबै रणधीर मनं । वर बैन कहै पन धारि घनं ॥४४७॥ महिमंद २ अली मुख आय जुरचौ । दुहुँ बीर तहाँ तब जुद्ध करचौ ॥ अजमंत कमाँन लई कर मैं । रणधीर कै तीर कढ्यौ उर मैं ॥४४८॥ रणधीर सु कोपि कै साँगे लई । अजमंत कै फूटि ३ कै ४ पार गई ॥ परियौ अजमंत सु खेत जबै । महमंद अली फिरि आय ५ तबै ॥४४९॥ रणधीर सु कोपि कै बैन कहैं । कर देखि अचै मति भुल्लि ६ रहै ॥ किरवाँन सु धीर के अंग दई । कटि टोप कछू सिर माँझ ७ भई ॥४५०॥ तब कोप कियौ रणधीर मनं । किरवाँन दई महमंद तनं ॥ परियौ महमंद अमंद बली । तब साहि कि सैन सबै जु हली ॥४५१॥ लुथि ८ लुत्थि परैं बहु बीर अरैं । बहु खंजर पंजर पार करैं ॥ १ अजमत्ति । २ महमद्द । ३ फुटि । ४ रु । ५ आयौ । ६ भूलि । ७ माँहि । ८ जुथि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

८० \qquad\qquad\qquad\qquad\qquad हम्मीररासो धर सीस परै करि रीस मनं । कर पाँव कटै बहु कीन पनं ॥४५२॥ यहि भाँति भिरे चहुवाँन बली । मुरि साह की सेनि सु भग्गि चली१॥ बलखी जु परे जु हजार असी । लखि कालिय अट्ठ सु हास हँसी ॥४५३॥ चहुवाँन परे इक जो सहसं । सुरलोक सबै बर बीर बसं ॥४५४॥ दोहरा छंद असां सहस२ बलखी परे, महमद अजमत खाँन । तहाँ राव रणधीर कै, परे सहस इक ज्वॉन ॥४५५॥ भजी३ फौज सब४ साह की, परे मीर दोइ बीर । करे याद पतिसाह तब, गज्जति गढ़ कै पीर ॥४५६॥ चौपाई छंद भज्जिय५ फौज साह की जबहीं । फिरो फिरो बानी कह सबहीं ॥ तहाँ साह करि कोप सु बुल्लिव । समर भुम्मि अब खंडि सुचल्लिव ॥४५ ॥ सरबसु खाय भोग करि नाना । अबै परम प्रिय लागत६ प्राना ॥ समर बिमुख तैं जानव जोई । हनूँ७ आप कर तजौं न सोई ॥४५८॥ सुने साह कै कोप८ सु बैनं । फिरिय सैन इम मंत्र सु ऐनं९ ॥ १ हली । २ हजार । ३ भगी । ४ जब । ५ भागी, भाजी । ६ लगत । ७ हनों । ८ कोपि । ६ फिरि सैन इक मत्त सु ऐनं । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ८१ बगतर पक्खर टोप सु सज्जिय । जुरे जंग बहु मीर सु गज्जिय ॥४५९॥ दोहरा छंद बादित ¹ खाँ पतिस्याह सों, करी सलाँम सु आय । हजरत देखहु ² हाथ ³ मम, कैसी करूँ ⁴ बनाय ॥४६०॥ पद्धरी छंद करि ⁵ कोप बादित खाँ जुरे जंग । मनौँ प्रलै पावक उठे अंग ॥ गुंजत निसाँन फहरात धुज्ज । जुटि जिरह टोप तन नैन सज्ज ⁶ ॥४६१॥ किए ⁷ हुक्म साह तन मैं रिसाइ । किन्हौ सु जंग फिर बीर आइ ⁸ ॥ छुटंत ⁹ तोप मनु वज्रपात । जल सुक्कि धरा छुटि गर्भ जात ॥४६२॥ बहु बाँन चलत ¹⁰ दोउ ओर घोर । अररात ¹¹ अमित मच्यौ महा सोर ॥ भए अंध धुंध सुझै न हथ्थ । बीर चहुवाँन तहाँ ¹² करि अकथ्थ ॥४६३॥ रणधीर उतै बायत्ति खाँन । बजरंग अंग जुट्टे सुयाँन ॥ हज़ार बीस बादित्य साथ ¹³ । १ वदितखाँ । २ पिक्खहु । ३ हथ्थ । ४ करौं । ५ करि कोप जुरे, जुरिव, जुर्यठ, जुरिग बादित्य जंग । ६ जुटि जिरह जिरै तहँ नैन सुज्झ । ७ किय । ८ सहनाय भरै बज्जे तबल्ल । बहु बोर ( चहुँ ओर ) सोर कै करत हल्ल । ६ छुट्टंत । १० छुट्ठि दुहुँ । ११ अर्रत (ट) अमित मच्यौ सु सोर । १२ जुज्झ कीनौ । १३ सत्थ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

८२ हम्मीररासो सब जुरे आय रणधीर हाथ^१ ॥४६४॥ बज्जत सार गज्जंत भ्रम्भ । रणधीर सथ्थ आये स सभ्भ^२ ॥ करि क्रोध जोध बाहंत सार । टूटंत^३ अंग फूटंत^४ पार ॥४६५॥ करि खेल सेल दोउ^५ ओर बीर । बाहंत बीर किरवाँन धीर ॥ हज्जार बीस बघत साह^६ । धर परे बीर करि अकथ गाह^७ ॥४६६॥ रणधीर मीर दोउ भिरे आइ । बाहत्त गहि गुर्ज तब रोस बाइ ॥ लग्गी सुढाल भू त्रुटि^८ ताँम । फिर^९ दई सीस किरवाँन जाँम ॥४६७॥ लग्गी सु सीस धर परचौ जाय । दुइ टुक^१० होय भुमि^११ अद्ध काय ॥४६८॥ दोहरा छंद भयौ सोच जिय साह कै, जीतिय^१२ जंग हमीर । बादित खाँ से रन परे, बीस हजार सु बीर ॥४६९॥ महरम खाँ कर जोरि कै, करै अर्ज तिहिं बार । लै कर सेख हमीर अब, किसो(?) मिल्यौ यहिं बार ॥४७०॥ गही तेग तुम सौँ अबै^१३, हठ नहिं तजै हमीर । सेख देय मिल्लै नहीं, पन सचो^१४ बर बीर ॥४७१॥ १ हत्थ । २ सब्ब । ३ दुट्टंत । ४ फुट्टंत । ५ दुहुँ । ६ साथ सत्य । ७ गाय, गत्थ । ८ तुट्टि, फुट्टि । ६ फिरि धीर दई । १० टूक । ११ भुंमि । १२ जित्यौ, जित्यउ, जीत्यौ । १३ तबै । १४ साँचो । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ८३ छप्पय छंद कर कुराँन गहि साह सीस साहिब कौ नायौ १ । गढ़ दिस२दल चहुँ ओर घेरि रज अंबर छायौ ॥ देखि अलावदि साह कहैं दल बहल भारी । अब हमीर की अहलि३आय पहौंचीह सुसारी ॥ महरम्म खाँन इम उच्चरै अदलि हाथ४साहिब तनै । होनहार५ ह्वैहै अबै को जानै कैसी बनै ॥४७२॥ दोहरा छंद हजरति अपने इष्ट पर, पावक जरत पतंग । यह हमीर कबहुँ न तजै, सेख टेक रणथंभ६ ॥४७३॥ साह दसों दिसि जित्ति कै, अब आए७ रणथंभ । कहै८ राव रणधीर सों, जुरौ सूर रण रंग ॥४७४॥ अप्पन९ धर्म न छंडिए, कहै बात१० रणधीर । निसि बासर अब साह सौं, किज्जिय जंग हमीर ॥४७५॥ छप्पय छंद को कायर को सूर द्यौस११बिन दृष्टि१२ न आवै । बिन सूरज की साखि सार छत्री न समावै ॥ बीर गिद्ध१३ अरु संभु सकल पलहारी जेते । धर पर धरैं न पाँव रैन मैं दिनचर जेते१४ ॥ इम कहै राव रणधीर सौं मैं अधर्म्म नाहिन१५ कहूँ । अब अलावदी साह सौं रैन सार कबहुँ न गहूँ ॥४७६॥ १ नाये । २ देसल । ३ अदलि रही चाँद रोज सुसारी । ४ हत्थ । ५ का होनहार । ६ गढ़ जंग । ७ आइय । ८ कहै राव हम्मीर तैं धीर जुड़न रणथ्रंभ । ६ अपणो । १० बत्त । ११ दिवस । १२ दिस्ट । १३ गृद्ध । १४ तेते । १५ नहींन । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

८४ हम्मीररासो दोहरा छंद घाटी घाटी साह कै, माटी मिलत अमीर । राव जंग दिन मैं करै, राति लड़ै रनधीर ॥४७७॥ तारागढ़ कै पीर कौ, करै याद पतसाह । रणतमँवर की फते¹ दे, कदमूँ आऊँ चाह ॥४७८॥ छप्पय छंद जबहीं मीरा सयद् साह की मदत पठाए । सिर उतारि कर लिये राव परि सम्मुख धाए ॥ जब हमीर की भीर च्यारि सुर सुद्ध सु आए । ... ... ... ... ... ॥ गणनाथ संभु दिनकर अवर छेत्रपाल मन रब्जिए² । रणथंभ खेत दुहुँ ओर सों बीर पीर दुव सज्जिए ॥४७६॥ छंद भुजंगप्रयात लरै नो सयद्द³ रणथ्थंभ³ देवा । करै क्रोध भारी पिलै हर्ष भेवा ॥ गरब्जंत⁴ घोरंत आतंक भारी । घनै घोर५ बर्षत बर्षा करारी ॥ ४८० ॥ कभू हल्लवै भुम्मि गज्जंत बीरं । कभू घोर अंधार बर्षत पीरं ॥ गणनाथ हथ्थं लिये तिक्षि फर्सी । पिनाकी पिनाँकं किये आप दर्सी ॥ ४८१ ॥ धरे मुद्गरं हथ्थ⁶ भैरव अमानो । इसे देव जुट्टे सु कट्टे अमानो ॥ इतैं पीर हजरत कै सथ्थ⁷ पिल्ले । १ विजय । २ रंजिए । ३ सयद् रणथम्भ । ४ गर्जंत, गज्जंत । ५ घाय । ६ हाथ । ७ साथ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ८५ अबदलल एकं¹ हुसैनं सुभिल्ले ॥ ४८२ ॥ रहीमं सयद्दं सुलत्तान जक्की । अहमद्द कानीर सूलं सु मक्को ॥ इतै बीर जुद्धे सु कट्टे पुरानं । भयौ जुद्ध भारी सु भूले² कुरानं ॥ ४८३ ॥ परे खेत नो सैद³ दड्ढे धरन्नी । हँसे संकरं भैरवं की करन्नी ॥ परे पीर यूं नौ रसूलं सु अल्ली । परचौ पीरे दूजो कुतव्वं सु चल्ली ॥ ४८४ ॥ परचौ जो हुसैनं करचौ जुम्भ⁴ भारी । परे हेरि हिम्मत्ति अल्ली सुधारी ॥ सयद्दं सुलत्तान आयौ जु मक्का । अदल्ली परे और तुकी सु बंका ॥ ४८५ ॥ परचौ दूसरो जो रसूलं सु खेतं । तबै बादस्याहू भयौ सो अचेतं ॥ परे मीर नौ सैद जानंत साहं । लरे अट्ठ बीरं हटै वैन काहं ॥ ४८६ ॥ अजंमत्त भारी हमीरं सु जानो । तबै कुच्च किन्नौ दरै छाड़ि कानी ॥ उलट्ठे परे जोय किन्नौ दिवानं । जुरे खाँन जेते सु तेते अमॉंनं ॥ ४८७ ॥ वजीरं अमीरं सबै खाँन बुल्ले । सबै बात मंत्रं सु संत्री सु खुल्ले ॥ ४८८ ॥ दोहरा छंद मरहम खाँ उज्जीर तब, अरज करी सब खोलि⁵ । १ इक्कं । २ भुल्ले । ३ सयद, सद्ह । ४ जुद्ध । ५ खुल्लि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri