हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ हम्मीररासो दोहरा छंद घाटी घाटी साह कै, माटी मिलत अमीर । राव जंग दिन मैं करै, राति लड़ै रनधीर ॥४७७॥ तारागढ़ कै पीर कौ, करै याद पतसाह । रणतमँवर की फते¹ दे, कदमूँ आऊँ चाह ॥४७८॥ छप्पय छंद जबहीं मीरा सयद् साह की मदत पठाए । सिर उतारि कर लिये राव परि सम्मुख धाए ॥ जब हमीर की भीर च्यारि सुर सुद्ध सु आए । ... ... ... ... ... ॥ गणनाथ संभु दिनकर अवर छेत्रपाल मन रब्जिए² । रणथंभ खेत दुहुँ ओर सों बीर पीर दुव सज्जिए ॥४७६॥ छंद भुजंगप्रयात लरै नो सयद्द³ रणथ्थंभ³ देवा । करै क्रोध भारी पिलै हर्ष भेवा ॥ गरब्जंत⁴ घोरंत आतंक भारी । घनै घोर५ बर्षत बर्षा करारी ॥ ४८० ॥ कभू हल्लवै भुम्मि गज्जंत बीरं । कभू घोर अंधार बर्षत पीरं ॥ गणनाथ हथ्थं लिये तिक्षि फर्सी । पिनाकी पिनाँकं किये आप दर्सी ॥ ४८१ ॥ धरे मुद्गरं हथ्थ⁶ भैरव अमानो । इसे देव जुट्टे सु कट्टे अमानो ॥ इतैं पीर हजरत कै सथ्थ⁷ पिल्ले । १ विजय । २ रंजिए । ३ सयद् रणथम्भ । ४ गर्जंत, गज्जंत । ५ घाय । ६ हाथ । ७ साथ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri