हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ८५ अबदलल एकं¹ हुसैनं सुभिल्ले ॥ ४८२ ॥ रहीमं सयद्दं सुलत्तान जक्की । अहमद्द कानीर सूलं सु मक्को ॥ इतै बीर जुद्धे सु कट्टे पुरानं । भयौ जुद्ध भारी सु भूले² कुरानं ॥ ४८३ ॥ परे खेत नो सैद³ दड्ढे धरन्नी । हँसे संकरं भैरवं की करन्नी ॥ परे पीर यूं नौ रसूलं सु अल्ली । परचौ पीरे दूजो कुतव्वं सु चल्ली ॥ ४८४ ॥ परचौ जो हुसैनं करचौ जुम्भ⁴ भारी । परे हेरि हिम्मत्ति अल्ली सुधारी ॥ सयद्दं सुलत्तान आयौ जु मक्का । अदल्ली परे और तुकी सु बंका ॥ ४८५ ॥ परचौ दूसरो जो रसूलं सु खेतं । तबै बादस्याहू भयौ सो अचेतं ॥ परे मीर नौ सैद जानंत साहं । लरे अट्ठ बीरं हटै वैन काहं ॥ ४८६ ॥ अजंमत्त भारी हमीरं सु जानो । तबै कुच्च किन्नौ दरै छाड़ि कानी ॥ उलट्ठे परे जोय किन्नौ दिवानं । जुरे खाँन जेते सु तेते अमॉंनं ॥ ४८७ ॥ वजीरं अमीरं सबै खाँन बुल्ले । सबै बात मंत्रं सु संत्री सु खुल्ले ॥ ४८८ ॥ दोहरा छंद मरहम खाँ उज्जीर तब, अरज करी सब खोलि⁵ । १ इक्कं । २ भुल्ले । ३ सयद, सद्ह । ४ जुद्ध । ५ खुल्लि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri