हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ हम्मीररासो लख बलखी उमराव तो, सदकै भए हरोल ॥४८९॥ अरु बकसी के बचन सुनि, साह कियौ१ अति सोच। निबहीं राव हमोर की, गिनौ हमें सब पोच२ ॥४६०॥ महिमा साह हमीर गढ़, ये तीनों३ साबूत। बाजो रही हमीर की, मैं कायर४ जु कपूत ॥४६१॥ छप्पय छंद महरम खाँ कर जोरि साह५ कौं ऐसैँ भाख्यौ। इक हिकमत तुम करो नीक जानो तो राखो६ ॥ महल७ छाड़ि करि फते बहुरि गढ़ सौं जुध८ किज्जिय। तोरि छाड़ि रणधीर मारि कै पकरि सु लिज्जिय९ ॥ आतंक संक गढ़ मैं परै मिलै राव हठ छोड़ि१० कै। गहि सेख देय मिलि सुत्तवै करो कूच जब उलटि कै ॥४६२॥ चौपाई छंद कहै साह महरम खाँ सुनियो। यह मत खूब किया तुम गुनिथो११ ॥ छाड़ि दरा कौ प्रथम दिली१२ जे। चंद रोज महँ फतह जु कीजे१३॥४९३॥ दोहरा छंद मरहम खाँ पतसाह को, हुकम पाय तिहिं बार। सकल सेन तजबीज करि, घेरी छाड़ि हँकार ॥ ४६४ ॥ छंद बियक्खरी कोप पतिसाह गढ़ छाड़ि लगै। १ कियव । २ सोच । ३ तीन्यू, दोऊ । ४ कातर । ५ तबै हजरति सों भाख्यौ । ६ रख्यौ भक्ख्यौ, रक्ष्यौ अंत्यानुप्रास । ७ पहल पहलै । ८ जंग कीजे । ९ लीजे । १० छाड़ि । ११ सुनिए, गुनिए अंत्यानुप्रास । १२ दिलिजिय । १३ किज्जिय । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri