हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ८१ बगतर पक्खर टोप सु सज्जिय । जुरे जंग बहु मीर सु गज्जिय ॥४५९॥ दोहरा छंद बादित ¹ खाँ पतिस्याह सों, करी सलाँम सु आय । हजरत देखहु ² हाथ ³ मम, कैसी करूँ ⁴ बनाय ॥४६०॥ पद्धरी छंद करि ⁵ कोप बादित खाँ जुरे जंग । मनौँ प्रलै पावक उठे अंग ॥ गुंजत निसाँन फहरात धुज्ज । जुटि जिरह टोप तन नैन सज्ज ⁶ ॥४६१॥ किए ⁷ हुक्म साह तन मैं रिसाइ । किन्हौ सु जंग फिर बीर आइ ⁸ ॥ छुटंत ⁹ तोप मनु वज्रपात । जल सुक्कि धरा छुटि गर्भ जात ॥४६२॥ बहु बाँन चलत ¹⁰ दोउ ओर घोर । अररात ¹¹ अमित मच्यौ महा सोर ॥ भए अंध धुंध सुझै न हथ्थ । बीर चहुवाँन तहाँ ¹² करि अकथ्थ ॥४६३॥ रणधीर उतै बायत्ति खाँन । बजरंग अंग जुट्टे सुयाँन ॥ हज़ार बीस बादित्य साथ ¹³ । १ वदितखाँ । २ पिक्खहु । ३ हथ्थ । ४ करौं । ५ करि कोप जुरे, जुरिव, जुर्यठ, जुरिग बादित्य जंग । ६ जुटि जिरह जिरै तहँ नैन सुज्झ । ७ किय । ८ सहनाय भरै बज्जे तबल्ल । बहु बोर ( चहुँ ओर ) सोर कै करत हल्ल । ६ छुट्टंत । १० छुट्ठि दुहुँ । ११ अर्रत (ट) अमित मच्यौ सु सोर । १२ जुज्झ कीनौ । १३ सत्थ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri