हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ५७ ईस कहौ अब्र कोन जुद्ध जो हम सौं मंडै । देत दुनी तैं कढ्ढि गर्व नातैं क्यों मंडै १ ॥ साहिब्ब बचन इम उच्चरै अली औलिया पोर गनि । महिमा साह जु रक्खि तुव अजहूँ समुझि हमीर मनि२ ॥३२४॥ दोहरा छंद दूजा हजरति का लिख्या, बाँचि राव फरमाँन । बार बार क्यों लिखत है, तजूँ न हठ की बाँन ॥३२५॥ पच्छिम सूरज उग्गवै, उलटि गंग बह नीर । कहो दूत पतिसाह सौं, तौ हठ न तजै हमीर ॥३२६॥ छप्पय छंद दियौ पद्म ऋषिराज करौं जब लग मैं सोइय । जो गढ़ आयौ निमत साह रक्खै नहिं कोइय ॥ अनहोनी नहिं होय होय होनी हैं सोइय । रजिक३ मोति हरि हथ्थ डर सु मानव क्यों कोइय ॥ नहिं तजूँ सेख को प्रण करिव सरन धरम छत्रिय तनौं । नन है बिचित्र महिमा तनो सत्य बचन मुख तैं भनों ॥३२७॥ चले दूत सुरझाय, दिलिय दिसि कियौ पयानो । गढ़ रणथँभ हम्मीर साह कैसै कम जानो ॥ हयद़ल पयद़ल सेन सूर बर बीर सवायौ । हठी राव चहुवाँन बंस यहि हठ चलि आयौ ॥ यहि बिधि सु तुमहूँ धर लखै४ हरे५ सकत्त तुम बीर बर । अब पतिसाह जु एक भुव६ कै तुम कै जु हमीर बर ॥३२८॥ सुनत दूत कै बचन साहि जब मन मुसकाए । कितो राज हम्मीर करै हठ मोहिं बुलाए ॥ १ तंडै । २ तुव । ३ रिजक । ४ लिखै । ५ हरयौ । ६ भव । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri