भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 258 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

हम्मीररासो ४९ हिय क्रोध अगिन साँ^१ उठत ऊक^२ ॥२७६॥ को^३ करै बैर बिन कर्म्मबीर । मिट^४ गये अन्न जल को सु सोर ॥ तिहिं^५ कौन रहै रक्खै सु कौन । यह जानि मर्म तुम रहो मौन ॥२७७॥ यह सुनत मीर गबरू सुभाय । सो^६ पर्यौ धर्नि मुच्छा सु खाय ॥ तदि कर्यौ बोध यहु बिधि सुताहिं । नहिँ करो सोच रहो^७ निकट साहि ॥२७८॥ तब कहूँ मीर गबरू सु ताहिं । सब तजो देश मक्के सु जाहि ॥ कै रहो राव हम्मीर पास । तन रहै खुसी नासै जु त्रास ॥२७६॥ तब चलिव सेख तजि साहि देस । सब^८ सुभट संग लिन्हे^९ सुबेस ॥ सत पंच सैन गजराज पंच । रथ सत्थ लिये निज नारि संच ॥२८०॥ सब रखत साज निज संग लीन । दासी^१० जु दास सुंदर नवीन ॥ सजि साज बाज डेरे अनूप । लदि ऊँट किते सँग चलिय^११ जूप ॥२८१॥ चढ़ि^१२ सैन सज्योँ निज संग बाँम । १ यौं । २ हूक हुक्क । ३ महिमा साहोवाच । ४ मिटि अन्न जहाँ जाके सनीर । ५ तव । ६ सुइ परचो धरनि मुर्छा सुखाइ । ७ रहु । ८ निज । ६ लीन्हे । १० सब दासि दास । ११ चले । १२ सजि सेख चढ्यौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri