हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ४९ हिय क्रोध अगिन साँ^१ उठत ऊक^२ ॥२७६॥ को^३ करै बैर बिन कर्म्मबीर । मिट^४ गये अन्न जल को सु सोर ॥ तिहिं^५ कौन रहै रक्खै सु कौन । यह जानि मर्म तुम रहो मौन ॥२७७॥ यह सुनत मीर गबरू सुभाय । सो^६ पर्यौ धर्नि मुच्छा सु खाय ॥ तदि कर्यौ बोध यहु बिधि सुताहिं । नहिँ करो सोच रहो^७ निकट साहि ॥२७८॥ तब कहूँ मीर गबरू सु ताहिं । सब तजो देश मक्के सु जाहि ॥ कै रहो राव हम्मीर पास । तन रहै खुसी नासै जु त्रास ॥२७६॥ तब चलिव सेख तजि साहि देस । सब^८ सुभट संग लिन्हे^९ सुबेस ॥ सत पंच सैन गजराज पंच । रथ सत्थ लिये निज नारि संच ॥२८०॥ सब रखत साज निज संग लीन । दासी^१० जु दास सुंदर नवीन ॥ सजि साज बाज डेरे अनूप । लदि ऊँट किते सँग चलिय^११ जूप ॥२८१॥ चढ़ि^१२ सैन सज्योँ निज संग बाँम । १ यौं । २ हूक हुक्क । ३ महिमा साहोवाच । ४ मिटि अन्न जहाँ जाके सनीर । ५ तव । ६ सुइ परचो धरनि मुर्छा सुखाइ । ७ रहु । ८ निज । ६ लीन्हे । १० सब दासि दास । ११ चले । १२ सजि सेख चढ्यौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri