हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४ ) को मारकर उनका वंश पर्य्यंत नाश कर डाला और उनके रुधिर से पितृ-देवताओं का तर्पण किया । इस प्रकार परशुराम के पराक्रम से प्रसन्न हुए पितृ-देवताओं ने परशुराम को शांत होकर तप करने की आज्ञा दी । आबूराज पर्वत पर यज्ञ और चहुआनों की उत्पत्ति— इधर सृष्टि के शासनकर्ता क्षत्रियों के समूल उन्मूल हो जाने से जब परस्पर अन्याय आचरण के कारण प्रजा पीड़ित हो उठी और दैत्य और राक्षसों के उपद्रव से ऋषि लोगों के यज्ञादि कर्मों में भी विघ्न पड़ने लगा तब ऋषिगण संसार की रक्षा और उसके उचित शासन के निमित्त फिर क्षत्रियों के उत्पन्न करने की अभिलाषा से यज्ञ करना विचारकर अर्बुदगिरि अर्थात् आबू के पहाड़ पर गए । वहाँ पर सब ऋषियों ने शिव की आराधना की । तब शिव ने भी वहाँ आकर मुनिवरों की प्रार्थना स्वीकार की और वे उक्त पर्वत पर अचल रूप से विराजमान हुए; अस्तु तब मुनिवरों ने भी सुंदर वेदिका रचकर यज्ञ-कर्म्म आरंभ किया । इस यज्ञ में द्वैपायन, वशिष्ठ, लोम, दालिभ, जैमिनि, हर्षण, धौम्य, भृगु, घटयोनि, कौशिक, वत्स, मुद्गल, उद्दालक, मातंग, पुलह, अत्रि, गौतम, गर्ग, शांडिल्य, भरद्वाज, जावालि, मार- कंडेय, जरत्कारु, जाजुल्य, पराशर, च्यवन और पिप्पलाद आदि मुनियों का समारोह हुआ था । इसके अतिरिक्त शिव और ब्रह्मा भी स्वयं वहाँ उपस्थित थे । इस प्रकार समुचित प्रकार से जिस समय यज्ञ हो रहा था और वेदिका से उत्पन्न हुई अग्निशिखाएँ आकाश को स्पर्श कर रही थीं, उसी समय उस वेदिका में से चालुक्य, प्रमार और परिहार क्षत्रिय क्रम से निकले । इन्होंने मुनिवरों की आज्ञा पा दैत्यों से युद्ध भी किया; किंतु उन्हें परास्त करने में वे समर्थ न हो सके । तब ऋषियों ने उक्त यज्ञस्थल को त्यागकर उसी पहाड़ पर नैऋत दिशा में दूसरा अग्निकुंड निर्माण किया । इस बेर के यज्ञ में ब्रह्मा ने ब्रह्मा, भृगु मुनि ने होता, वशिष्ठ ने आचार्य्य, वत्स ने ऋत्विक और परशुराम ने यजमान का कार्य संपादन किया ।