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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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( ५ ) निदान इस यज्ञ से जो अग्नि के समान तेजवाला पुरुष उत्पन्न हुआ उसका नाम चहुआन जी हुआ; क्योंकि इनके चार बाहु थे और प्रत्येक बाहु खड्ग, धनुष, शूल और चक्र इन चारों आयुधों को धारण किए हुए था। इस पुरुष ने ऋषिवरों के आशीर्वाद और निज कुलदेवी आशापूरा के प्रसाद से संपूर्ण दैत्यों का वध कर ऋषि और देवताओं को प्रसन्न किया । कथामुख—इस प्रकार यज्ञकुंड से उत्पन्न चहुआन जी के वंश में बहुत दिनों पीछे विक्रमीय १२वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के आरंभ में राव जैतराव चहुआन जन्मे । एक समय जैतराव जंगल में शिकार खेलने गए । वहाँ उन्होंने एक बलवान् बाराह को देखकर उसके पीछे घोड़ा डाल दिया । बहुत दूर निकल जाने पर एक गंभीर वन में बाराह तो अदृष्ट हो गया और राव जी संगी साथियों से छूटकर चकित चित्त अकेले उस वन में भटकते फिरने लगे । ऐसे समय में वहाँ उन्हें एक ऋषि का आश्रम देख पड़ा । वहाँ जाकर वे देखते क्या हैं कि परम रमणीय पर्णकुटी में कुशासन पर बैठे हुए पद्म ऋषि जी ध्यान में मग्न हैं । राव जी ने उनके निकट जाकर साष्टांग प्रणाम किया और उनके दर्शन से अपने को कृतार्थ जानकर वे उनकी स्तुति करने लगे । निदान तब ऋषि ने भी प्रसन्न होकर राव जी को आशी- र्वाद दिया, और कुछ दिवस पर्य्यंत उसी स्थान पर रहकर उन्हें शिवार्चन करने का भी उपदेश दिया । राव जी ने वैसा ही करके शिव को प्रसन्न किया । तब ऋषि ने पुनः आज्ञा दी कि राव जी तुम यहाँ एक गढ़ भी निर्माण करो । अस्तु राव जी ने उसी समय अपने मित्र, मंत्री और सुहृदों को बुलाकर संवत् १११० वैशाख सुदी अक्षय तृतीया, शनिवार को पाँच घटी सूर्य्योदय में रणथंभगढ़ की नींव डाली और उसी के उपस्थ में एक रमणीक नगर भी बसाया । ऋषि का तप भंग होना—उस पर्वतावेष्टित प्रच्छन्न एवं दृढ़ दुर्ग की रम्य भूमि को पद्म ऋषि ने राव जी से अपने रहने के लिये माँग लिया और उसी में रहकर वे तप करने लगे । जब उनके उम्र