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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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( ६ ) एवं पवित्र तप की सूचना इंद्र को मिली तब भीरुहृदय इंद्र ने अपने श्रीभ्रष्ट होने के भय से आशंकित होकर पद्म ऋषि का तप भ्रष्ट करना चाहा और इसीलिये उसने इस कर्म के लिये कुकर्मी- मकरकेतु को उपयुक्त जानकर उसे आज्ञा दी कि हे मित्र, तू अपने सच्चे सहचर बसंत के सहित जाकर रणथंभ गढ़ में तप करते हुए तेजस्वी पद्म ऋषि की श्री नष्ट कर दे । इस प्रकार इंद्र से उत्तेजित किया हुआ कामदेव अपनी सहकारी षड् ऋतुओं सहित रणथंभ गढ़ में ध्यानमग्न पद्म ऋषि को जाग्रत करने की इच्छा से ऋतुओं के उपचार का प्रयोग करने लगा, किंतु ग्रीष्म का प्रचंड मार्तंड और मलय समीर, पावस के पपीहा, शरद् की स्वच्छ चाँदनी, शिशिर के दुशाला और हेमंत के पाला को पराजित करनेवाले मसाले भी जब ऋषि की समाधि भंग न कर सके, तब उस कुसुमायुध ने साक्षात् शिव को रसिक बनानेवाले वसंत का प्रयोग किया अर्थात् उस जनशून्य वन में नाना प्रकार के पुष्प प्रस्फुटित हुए और उनपर मधुप गुंजार करते हुए आनंद से मकरंद पान करने लगे, जहाँ तहाँ नाना वर्ण के पक्षी-शावक कलरव करते हुए कल्लोल करने लगे । उसी समय इंद्र द्वारा प्रेरित अप्सराओं ने आकर नृत्य और गान करते हुए उस शिखरशैली को इंद्र का अखाड़ा बना दिया, तब उपयुक्त समय जानकर कामदेव ने भी अपने शरों से मुनिवर के शरीर को बेध दिया । इस प्रकार समाधि भंग होने पर जब मुनि ने आँख उठाकर देखा तो देखते क्या हैं कि उस रणथंभ के अभेद्य दुर्ग में शांत रस को पराजित कर श्रृंगार रस ने पूर्णतया अपना अधिकार जमा लिया है और एक चंद्रमुखी मृगलोचनी, गयंद-गामिनी, नवयौवना सन्मुख खड़ी हुई मुनि की ओर कटाक्ष-सहित देख रही है । यह देखकर पद्म ऋषि के शरीर से शांति और तप इस प्रकार विदा हो गए जैसे तुषारतोषित वृक्ष सुकोमल पल्लवों को त्याग देते हैं, एवं जिस प्रकार फल के लगते ही वृक्षगण सूखे पुष्प का अनादर कर देते हैं । इस प्रकार कामातुर होकर पद्म ऋषि समाधि छोड़ सुंदरी