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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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( ८ )

जिस समय रणथंभ गढ़ में हम्मीर का जन्म हुआ उसी समय ग़जनी में शहाबुद्दीन के पुत्र अलाउद्दीन का तथा मीणा के घर महिमा मंगोल दोनों भाइयों का और गभरू के घर उक्त स्त्री का अवतार हुआ । **हम्मीर और अलाउद्दीनशाह का वैर—**एक समय वसंत ऋतु के आरंभ में अलाउद्दीन ने सहस्रों सैनिक और अमीर उमरावों तथा बेगमों को साथ लेकर शिकार के लिये यात्रा की । उसने एक परम रमणीक वन प्रांत में शिविर लगवा दिए और वह उसी वन में इतस्ततः आखेट करके जंगली जंतुओं के प्राण संहार करने लगा । इसी प्रकार जब वसंत का अंत होकर ग्रीष्म के आतप से भूमि उत्तापित हो रही थी, अलाउद्दीन सब सरदारों सहित शिकार खेलने चला गया। इधर बेगमें भी अपनी सखी सहेलो और अगनित खोजाओं को लेकर एक कमलवन-संपन्न निर्मल सरोवर पर जाकर जलक्रीड़ा करने लगीं । दैवयोग से उसी समय सहसा वायु का वेग बढ़ते बढ़ते इतना प्रचंड हो गया कि बड़े बड़े मेघस्पर्शी वृक्ष टूट- टूटकर गिरने लगे; धूलि के आकाश में आच्छादित हो जाने के कारण घोर अंधकार छा गया । इस आकस्मिक घटना से भयभीत होकर सब लोग तीन तेरह होकर अपने अपने प्राणों की रक्षा करने के लिये जहाँ तहाँ भागने लगे, जलक्रीड़ा करती हुई बेगमों में से “रूपविचित्रा” नामक एक बेगम जो कि स्वरूप और गुण में सब बेगमों से श्रेष्ठ थी, भटककर एक ऐसे निर्जन प्रांत में जा पहुँची जहाँ हिंसक जंतुओं के भीषण नाद के सिवाय अन्य शब्द ही न सुन पड़ता था । जिस समय रूपविचित्रा भय एवं शीत के कारण थर थर काँपती हुई प्राणरक्षा के लिये ईश्वर का स्मरण कर रही थी उसी समय महिमा मीर वहाँ आ पहुँचा । जब उसे पूछने पर ज्ञात हुआ कि उक्त स्त्री बादशाह की बेगम है, तब उसने उसे घोड़े पर बैठालकर शिविर में ले जाने का आग्रह किया । इसपर रूपविचित्रा ने मीर महिमाशाह को धन्यवाद देकर कहा कि इस समय मेरा शरीर शीत