हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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से अधिक व्याकुल हो रहा है, इसलिये तू आलिंगन से मुझे संतुष्ट कर । इसपर महिमाशाह ने उत्तर दिया कि एक तो मैं किसी भी पराई स्त्री को अपनी भगिनीवत् मानता हूँ तिसपर आप मेरे स्वामी की स्त्री हैं इसलिये आप मेरी माता समान हैं अतएव मैं यह अकर्त्तव्य एवं पाप कर्म करने को कदापि सहमत नहीं हूँ । तब रूपविचित्रा ने पुनः उत्तर दिया कि क्या आप यह नहीं जानते कि अपने मुख से माँगती हुई स्त्री को रति-दान न देना भी तो एक ऐसा पाप है कि जिसका कोई प्रायश्चित्त है ही नहीं, और हे वीर युवक, तेरे रूप और गुणों की प्रशंसा पर मोहित हुआ मेरा मन तेरे लिये बहुत दिनों से व्याकुल है । भाग्यवश आज यह संयोग प्राप्त हुआ है। बेगम की ऐसी बातें सुनकर महिमाशाह का भी मन डोल उठा और तब उसने घोड़े को एक समीपवर्ती वृक्ष से बाँध दिया हथियार खोल- कर पास रख लिए और वहीं उस स्त्री की मनोकामना पूर्ण करने लगा । उसी समय एक गर्जता हुआ विकराल सिंह सामने आता देख पड़ा । उसे देखकर रूपविचित्रा थर थर काँपने लगी, किंतु महिमाशाह ने उसे धैर्य देकर कहा कि भय मत करो कोई डर नहीं, और कमान को उठाकर एक ही बाण से उसने सिंह को मार डाला । उपर्युक्त प्राकृतिक उपद्रव के शांत होते ही सहस्रों मनुष्य बेगम की खोज में इधर-उधर फिरने लगे । उनमें से कोई कोई तो बेगम के पास तक आ पहुँचे और उसे शाही शिविर में लिवा ले गए । रूपविचित्रा को पाकर अलाउद्दीन अत्यंत प्रसन्न हुआ जब ग्रीष्म का अंत हो गया और पावस की घनघोर घटाएँ घिर घिरकर आने लगीं तब अलाउद्दीन ने लश्कर-सहित दिल्ली को कूच कर दिया । दिल्ली के राजमहल में एक दिन आधीरात को जिस समय अलाउद्दीन रूपविचित्रा के पास बैठा था, उसी समय एक चूहा आ निकला । उसे देखते ही बादशाह का काम-ज्वर जीर्ण हो गया, किंतु उसने किसी प्रकार सम्हलकर उस चूहे को लक्ष्य करके एक ऐसा