हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ हम्मीररासो बहु दाँमनि सार चमंकि भनो ॥ घन गौर¹ सदायत देखतयं । ध्वज बैरख मंडल लूरत्तयं ॥८५७॥ बिरदावत बृंद कबिंद घने । मनो चात्रक मोर अनंद बने ॥ बगपंति सुदंति अनंत रजे । धुरवा करि सुंड छुटे भरजे ॥८५८॥ बहै² धार अपार जुधार बही । घन घोर सु नौबति नाद वही³ ॥ कर सोर समोर नकीब चले । यह भाँति दोउ दिस⁴ बीर⁵ मिले ॥८५९॥ करिये हंकार सुबीर चले । ... ... ... ... ॥ कह मीर सिकंदर नेम कियं । सिर नाय सुभाय हुकम्म लियं ॥८६० पहलै पुर जाय सु बीर भगं । रणथंभ कहा हजरत्ति अगं ॥ तुम सेर करथौ वह आप जथा । अब देखहु मोर सुहाथ जथा ॥८६१॥ सु जमीति खधार लई सबही । अरु मीर सिकंदर आय⁶ सही । करि कोप सिकंदर मीर चढ़े । तब राव हमीर कै भील कढ़े ॥८६२॥ तब भोज कही अब मोहिं कहो । १ घन घोर । २ वह सार अपार सु धार हुई । ३ जुई । ४ दल । ५ जोर । ६ आ पठई ।