हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १४५ इतने अब हत्थ हमार लहो ॥ तब राव कही रणथम्भ अगै । दुइ(रहु) जैत अगै सिर भील तगै ॥८६३॥ अर जैत सरन्नि सुराखि तबै । सरि कौन करै तुम्हरी जु अबै ॥ तुम संग रतन्न चितोर गढ़ं । चढ़ि जाहु हमार जु काज बढ़ं ॥८६४॥ सुंनि भोज इसे कहि बैन तबै । यह सीस तुम्हार निमित्त¹ अबै ॥ रणथंभहिं हेत जु सीस दिवै । अब ओर कहा बिन राव जिवै ॥८६५॥ यह औसर फोर बनै कबहीं । हजरत्ति हमीर मिलै जबहीं ॥ कहि बत्त इती जु सलाँम करी । अपनी सब लीन जमीन² खरी ॥८६६॥ सब भील कसे हथियार जबै । निकसे कढ़ि भोज श्रमाँन तबै ॥ कमठा³ कर तीर सम्हार उठे । उत मीर सिक्रंदर आय जुटे⁴ ॥८६७॥ बजि घोर निसाँन प्रमाँन⁵ मिले । दल कोप करे बहु तोप चले ॥ घमसाँन जुबाँन कियौ तबहीं । दुहु सैन सुऐन बने जबहीं ॥८६८॥ गजराज हरौल करे बलयं । १ निमत्त, निमत्य । २ जमीति । ३ कमठार कुठार । ४ उठे, बुठे। ५ श्रमाँन । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri