हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ हम्मीररासो उत सार अपार कढ़े दलयं ॥ . सजि भील अनी सुघनी हलकौ । कसि गातिय१ कोप कियौ बलकौ ॥८६९॥ कमठा कर धार अपार बलं । तब भोज मिल्यौ तहँ साह दलं ॥ नट कूदत२ जानि सु ढोल सुरं । बहै३ तीर अमीर सुजानि छुरं ॥८७०॥ करि कोप तबै गजदंत कढ़े । मुरि मूरिय धूरि उपारि बढ़े ॥ सब भीलन४ मत्त सुकोप कियं । जनु भाल बली मुख लंक लियं ॥८७१॥ जनु मार अपार कटार चलैं । बहु मीर अमीर रु भील मिलैं ॥ हजरत्ति सराहत भोज बलं । जनु मानव रिच्छ भिरत्त दलं ॥८७२॥ दोउ भोज सिकंदर मीर जुटे । मुख बानिय मीर अमीर रटे ॥ जब भोज कहै करि वार तुहीं । कहै मीर सिकंदर बूढ़ तुहीं ॥८७३॥ अब तोपर वार कहा करिये । सब लोक अलोक महा भरिये ॥ तब भोज स कोप कियौ रण मैं । करि कोप कटार दियौ तन मैं ॥८७४॥ तन कंगल भेदि धरन्नि पर्यौ ५ । किरवाँन चलाय स मीर हरख्यौ६ ॥
१ कागति । २ कुद्दत । ३ बहु । ४ भिल्लन । ५ धस्यौ । ६ हँस्यौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri