हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १४७ सिर भोज परयौ धरनी १ तल मैं। धर धावत रुंड लरै २ बल मैं ॥८७५॥ उत मीर सिकंदर भूमि परे ३ । बर हूर ४ . सुदूर सुआनि बरै ॥ परि खेत खधार अपार सबै । बिन सीस पराक्रम भोज अबै ॥८७६॥ भजि साह अनी तजि खेत तबै । परि भोज समाज सबीर सबै ॥ कसमीर अमीर सहस्र पची । सुमिले ५ धर धूर अली सु सची ॥८७७॥ तहाँ भोज स साथि हजार भले । बरि बाल सबै सुर लोक चले ॥८७८॥ दोहरा छंद परे ओज सँग भील भर, सहस दोइ इक ठौर। सहस पचीस कसमीर कै, अरुपँधार भर मौर ६ ॥८७६॥ सहस तीस बंधार कै, ओर सिकंदर मीर। अली सयद् ७ कै संग भट, परे मीर ८ दस भीर ॥८८०॥ भजी फोज पतसाह की, बिकल सकल उमराव । दोय सहस भट भोज सँग, रहे खेत करि चाव ॥८८१॥ चौपाई छंद राव हमीर भोज ढिंग आए। देखि ९ सु भोज नैन जल छाए ॥ तुम सब अमर भए कलि माहीं। १ धरनित्यल । २ भुम्मि लरै चल मैं । ३ भुम्मि गिरे । ४ हूरन । ५ उलटी भइ सेन दिलीस बची । ६ और । ७ सैद । ८ पीर । ६ देखि भोज भरि द्रग जल छाए। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri