हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ हम्मीररासो स्वामि काँम सब देह सराहीं ॥८८२॥ जो न सिकंदर साह जु आए । राव हमीर कै सनमुख धाए ॥ देखि साह आपन दल भज्जै । हजरति देखि हमीरह लज्जै ॥८८३॥ राव हमीर खेत महिं ठाढ़े । हजरति अंग कोप अति बाढ़े ॥ कहै साह तब कोप सु बैनं । फिरे सकल नीचे कर नैनं ॥८८४॥ सर्बसु भूमि¹ भोग कर नीके । जंग समय लालच कर जीके ॥ भगे जात जीवत महिं अबहीं । गई बात² बीरन की सबहीं ॥८८५॥ सुन ये बैन बीर खिसयाने । राव हमीर सु जुद्धहिं ठाने ॥ जैन सिकदर साह अमानो । अरु कंधार भीरु³ सब जानो ॥८८६॥ यह हम्मीर राव चहुवाँन । जुरे जुद्ध मनु काल समाँनं ॥ तोप तुपक चहूर सब दगिगय⁴ । कर कृपाँन चहुवाँन सु जगिगय⁵ ॥८८७॥ भुजंगप्रयात छंद परे दोय हज़ार भीलं⁶ समत्थं । तहाँ च्यारि ओर गिरे खेत सत्थं ॥ १ भुम्मि । २ बूड़ि । ३ मीर । ४ दागी, त्यागी । ५ जागी । ६ भिलं । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri