हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १४९ परे कासमीरं सहस्र पचीसं । अली सेर मीरं परे संग दीसं ॥८८८॥ तबै साह कोपं किये बैन रीसं । फ़िरे बीर लज्जा समेतं सुदीसं ॥ तबै राव हम्मीर कोपे सुजाँनं । चले¹ संग चहुवाँन बलवाँन राँनं ॥८८९॥ लिये सेन बंधार दो लख जामी । जबै जैन साहं सिकंदर सु नामी ॥ इतै राव हम्मीर कम्माँन लीनी । मनो पथ भारत्थ सारत्थ कीनी ॥८६०॥ लगैं तीर अगं हुवे पार गज्जैं । परैं पील भुम्मी² सु घुम्मैं गरज्जैं ॥ कहूँ पक्खरं³ बाजि फूटैं⁴ सरीरं । छुटैं प्राण बाँन सु लागतं तीरं⁵ ॥८६१॥ जुरे जंग मीरं अमीरं सु फौजं । इतै राव हम्मीर उत⁶ साह फौजं ॥ चढ़े⁷ राव कै रात्रतं जो अमानै । बनै बंगलं अंग जंगं सु ठानैं ॥८९२॥ करैं रंग कै अंग बानै अनेकं । घने केसर' साज लीने सु तेकं ॥ किते बीर तोरा तबल्लं बनाए । घने नेत बंधं गजं गाह लाए ॥८६३॥ किते मौर बंधं सजे केसराँनं । किते बीर बाँके चढ़े चाहुवाँनं ॥ १ चढ़े । २ भूमै सु चक्कर भजैं । ३ पाखरं । ४ फुटैं । ५ मनो मेघ पावस्स बूंदंत नीरं । इसे राव के हत्थ लागतं तीरं । ६ तैं । ७ बढ़े । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri