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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 258 में से

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पृष्ठ 236

१५० हम्मीररासो पढ़ैं पाहिं १ बंदीजनं बृंद भारे । मनो राति जोरंत टूटंत तारे ॥८९४॥ उठी उद्भू मोक्षं लगी नैन आई । उठे रोम अंगं सुजंगं मचाई ॥ उतै साह कीने २ घने गज्ज अग्गौं । मनो पाय चल्लैं पहारं सु मग्गौँ ॥ तिन्हैं उप्परैं साह ३ कै बीर धाए । गही तेग हत्थं उरं कोप छाए ॥८६५॥ इतै राव चहुवाँन कै बीर कोपे । मनो आजही साह कै बीर लोपे ॥ गर्जै सो हमीरं लखैं खेत राजैं । सबै सूर वीरं निसान्नं सु बाजैं ॥८९६॥ किते चाहुवानं पिले डाल पीलं । उठावंत मारंत पारंत ढीलं ॥ कहूँ सुंडि पै तेग बाहंत ऐसा । मनो रंभ भंभं कढैं तंग जैसी ॥८६७॥ कटैं दंत मातंग भाजत ३ जंते । गहैं पुच्छ सुईं पटकंत केते ॥ परैं पील पब्बत मनौ खेत भारी । बहैं रक्त ४ घावं मनो घाव कारी ॥८६८॥ तिहौं काल कबिराज उपम बिचारी । बहैं स्याम पब्बौ सु गेरू पनारी ॥ किते बाजि राजं पटकंत भूमैं । भए अंग भंगं खरे घाव घूमैं ॥८६६॥ कढ़ी तेग बेगं लपटं सु जानो ।


१ ताहिं । २ कीनं । ३ भज्जंत । ४ रत्त । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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