हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १५१ मनो ग्रीषमं लाय लग्गी सुमानो ॥ जुटे बीस बीरं गहीरं सु गज्जैं । ० भजे कायर१ खेत छंडे सु लज्जैं ॥६००॥ कटे सीस बाहू कहूँ पाव ऐसे । बहैं तेग बेगं मनो ढार जैसे ॥ लगैं कंध ग्रीवा तबै सीस टूटैं२ । परै सीस धरनी तबै रुंड झूटैं३ ॥६०१॥ घने सीस तरबूज से भुम्मि डारैं । लरैं रुंड खेतं सिरं हक्क४ मारैं ॥ चहैं बाँन किरवाँन५ बज्जन६ सारैं । मनो काठ काटंत७ कष्टे कुद्दारैं ॥६०२॥ बहैं सील अंगं परैं पार होई । मनो रुंड मैं नाग लपटंत सोई ॥ कटारी लगैं अंग दीसंत पारं । मनो नारि मुग्धा कढ्यौ पानि बारं ॥६०३॥ छुरी वार सूरं करैं जार ऐसे । मना सपंनो पुच्छ दीखंत जैसे ॥ लगैं जोर सों यों विषाएं जवाँन । हुवैं अंग पारं जुटैं जर बाँनं !६०४!। भए लत्थ वत्थं दुहूँ सेन ऐसे । मनो यों अधारे भिरे मल्ल जैसे ॥ पछारैं उखारैं भुजा सीस सूरं । उछारैं८ हँकारैं उठैं९ बीर नूरं ॥६०५॥ मची मांस मेदं धरा कीच भारी । १ कातरं । २ दुट्टैं । ३ झुटूटैं । ४ हाँक । ५ कम्माँन । ६ बाजंत । ७ कष्ट, कष्टंत । ८ उछल्लैं, हकल्लैं । ६ उडैं । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri