हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ हम्मीररासो चली मुट्ठि खेतं नदी मैं १ अकारी॥ बनैं कूल पीलं सुडोलं सु बग्गी। बहै बांच २ लोहू जलं धार गज्जी। ॥६०६॥ रथं चक्र आवर्त्त सो भौर मानो। घनं धंस बेला कुलं रूप मानो॥ नरौ ग्राह पावं करं खर्प जैसे। बनी अंगुरी मीन झींगा सु तैसे॥६०७॥ बहैं सीस इंदोवरं जानि फूले ३। खुले नैन यों चंचरीकं सु भूले॥ सिवालं सु केसं सुबेसं विराजैं। बने घाट बीसों खरे सूर गाजैं ॥९०८॥ भरैं जुगनी खप्परे सूर लोहो। मनो गाम बामा पनीहार सोही॥ करैं केलि भैरव हरं संग काली। मनो न्हात बैसाष कात्तिकवाली॥६०९॥ इसे घाट ओघाट ४ किन्ने ५ हमीरं। डरै कायर ६ साह कै मीर पीरं॥ भजी साह सेना सबै लाज डारी। भिरे खेत चहुवाँन गज्जंत ७ भारी ॥९१०॥ किते गिद्ध जंबू करालं सु चिल्ली। बगं ८ हंस केते बिहंगं सु झिल्ली॥ परे खेत साहं सिकंदर सु नामी। सवा लक्ख कंधार कै मीर बामी ॥९११॥ गिरे खेत हथ्थी ९ सतं पौन ऐसे।
१ बह। २ बिच्चि। ३ फुल्ले, भुल्ले अंत्यानुप्रास। ४ घट्ट औघट्ट। ५ कीने। ६ कातरं। ७ गाजंत। ८ वकं। ६ हाथी। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri