हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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मनो पब्वतं¹ अंग दीखंत जैसे ॥ कसे साठि² हौदा परे खेत माहीं । ज़रावं जरं कंचनं कै सुमाहीं । ६१२॥ परे डंबर' सौ कई गज्जराजं । कई प्राणहीनं कई मो समाजं ॥ परे सत पंचं निसानन्नवारे । किते फग्जराजं परे खेत भारे ॥९१३॥ सवा लक्ख बाजी परे जे अमाँनं । परे खेत साहं सिकंदर सुजाँनं ॥ तिनै साह³ लक्खं बँधारं सवायं । परे एक⁴ लक्खं दिलीसं सुपायं ॥९१४॥ दुहूँ इक्क⁵ मीरं परे खेत नामी । कहूँ नाँम ताकै परै खेत बामी ॥ परे दूसरे मीर सिर खाँन भारी । रहे खेत महरम्म खाँनं सुधारी ॥ ९१५॥ परे जौमजादेन से मीर नामी । मोहोबत्त मुद्दफ्फर परे इक्क ठामी ॥ परे नूर मीरं अफर्रस्स धोरं, । बली इक्क निज्जाँम दीनं सु पीरं ॥९१६॥ परे मीर एते दुहूँ खेत सूरं । बहै नोर ड्यों रक्त⁶ बाहंत कूरं⁷ ॥ नची जुग्गनी और भैरव सु नच्चैं । भखैं गिद्ध आमिष जंबू सु रुच्चैं ॥९१७॥ थके सूर रथ्थं सु जाँमं सवायं । महाबीर घायं स घूमंत तायं ॥
[Footnotes] १ पब्वयं । २ सट्ठि । ३ सांत । ४ इक्क । ५ एक । ६ रक्त । ७ सूरं, पूरं । CC Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri