हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
DevanagariHindipublished258 पृष्ठ
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१५४ हम्मीररासो बरै अच्छरी सूर१ बीरं सु अच्छे । खुले मोक्ष२ द्वारं प्रबेसंत गच्छे ॥१९८॥ भयौ मंडलं कुडलं भाँन नहं । कढ़े सूर बीरं सु धीर उपहं ॥ महा रौद्र भौ खेत देखत जानो। कियौ अद्भुतं देव सो जुद्ध मानो३ । १९९॥ परे खेत खंधार मीरं सु राते । इके लक्ख हज्जार पंचास४ जाते ॥ इतै सूर हम्मीर कै संहस च्यारं । सु तो बीर धीरं खुले मोक्ष द्वारं ॥९२०॥ दोहरा छंद तब हमीर हर ध्याँन करि, हर हर हर उच्चारि। गज निज सनमुख५ पेलि कै, जुरे६ साह सौं रारि ॥९२१॥ त्रोटक छंद गजराज हमीर सु पेलि७ बरं । मुख तै उचरंत सु भाव हरं ॥ किरवाँन८ कढ़ी वलवाँन हथं । सनमुख्खं सु साहि सु बोलि९ जथं ॥९२२॥ सुनिये सु अलावदि बैन अयं । करि द्वंद सु उद्व सु जुद्ध धयं ॥ सब सेन कहा करिहैं सु सुधं । हम आपन१० इक्क११ करैं सु जुधं ॥६२३॥ दुहुँ ओर उछाह अथाह सजे ।
१ आय । २ मोच्छि । ३ जानौं । ४ पच्चीस । ५ सम्मुख पेलि कै । ६ जुरिग, जुरिउ । ७ पिल्हि । ८ कम्माँन चढ़ी । ६ बुल्लि गयं। १० अप्पन । ११ एक । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri