हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १५५ हजरत्ति सु कोप अकथ्य¹ रजे ॥ सनमुख हमीर सु आय² जुटे। सब सथ्य जथारथ बेग³ हटे ॥९२४॥ तिहिं खेत⁴ खरे⁵ चहुवाँन नरं । पतिसाह सबै दल भज्जि⁶ भरं ॥ रहे मीर . उजीर कछूक तवै । चहुवाँनन कै दल देखि⁷ जबै ॥९२५॥ पतिसाह कही यह कौन बनी । सब सैन बड़ी⁸ चहुवाँन तनी ॥ तब मंत्र वजीर सु एमि कह्यौ⁹ । तुम मित्र सदा गुन जानि लह्यौ ॥६२६॥ सुनिराव सु दूत पठाय दयौ । चहुवाँनन सों हित जानि ठयौ ॥ अब¹⁰ विग्रह छाड़ि¹¹ सु संधि करो । चहुवाँनन सों हित जानि डरो¹² ॥ अपराध हमें सब दूरि करो । तुम होहु अभै हम कूच धरो ॥९२७॥ नृप सों चर जाय कही तबहीं¹³ । सुनि राव यहै मुख वत्त¹⁴ कही ॥ अब खेत चढ़े कछु संधि नहीं । यह बत्त हमारि सुजानि सही ॥९२८॥ रिपु तैं बिनती¹⁵ सुइ कातरता । १ अगत्थ । २ आनि । ३ देखि । ४ अत्त, ग्रत्थ, ग्रर्थं । ५ अरे । ६ भाजि । ७ दिक्खि, पिक्खि । ८ बढ़ी । ६ कियौ, लियौ अंत्यानुप्रास । १० व्यग्रह । ११ छंदि । १२ दुहुँ ओर महा सुख भूरि भरो । १३ जबही । १४ ब्रात । १५ बिन्नति । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri