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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

१५० हम्मीररासो पढ़ैं पाहिं १ बंदीजनं बृंद भारे । मनो राति जोरंत टूटंत तारे ॥८९४॥ उठी उद्भू मोक्षं लगी नैन आई । उठे रोम अंगं सुजंगं मचाई ॥ उतै साह कीने २ घने गज्ज अग्गौं । मनो पाय चल्लैं पहारं सु मग्गौँ ॥ तिन्हैं उप्परैं साह ३ कै बीर धाए । गही तेग हत्थं उरं कोप छाए ॥८६५॥ इतै राव चहुवाँन कै बीर कोपे । मनो आजही साह कै बीर लोपे ॥ गर्जै सो हमीरं लखैं खेत राजैं । सबै सूर वीरं निसान्नं सु बाजैं ॥८९६॥ किते चाहुवानं पिले डाल पीलं । उठावंत मारंत पारंत ढीलं ॥ कहूँ सुंडि पै तेग बाहंत ऐसा । मनो रंभ भंभं कढैं तंग जैसी ॥८६७॥ कटैं दंत मातंग भाजत ३ जंते । गहैं पुच्छ सुईं पटकंत केते ॥ परैं पील पब्बत मनौ खेत भारी । बहैं रक्त ४ घावं मनो घाव कारी ॥८६८॥ तिहौं काल कबिराज उपम बिचारी । बहैं स्याम पब्बौ सु गेरू पनारी ॥ किते बाजि राजं पटकंत भूमैं । भए अंग भंगं खरे घाव घूमैं ॥८६६॥ कढ़ी तेग बेगं लपटं सु जानो ।


१ ताहिं । २ कीनं । ३ भज्जंत । ४ रत्त । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो १५१ मनो ग्रीषमं लाय लग्गी सुमानो ॥ जुटे बीस बीरं गहीरं सु गज्जैं । ० भजे कायर१ खेत छंडे सु लज्जैं ॥६००॥ कटे सीस बाहू कहूँ पाव ऐसे । बहैं तेग बेगं मनो ढार जैसे ॥ लगैं कंध ग्रीवा तबै सीस टूटैं२ । परै सीस धरनी तबै रुंड झूटैं३ ॥६०१॥ घने सीस तरबूज से भुम्मि डारैं । लरैं रुंड खेतं सिरं हक्क४ मारैं ॥ चहैं बाँन किरवाँन५ बज्जन६ सारैं । मनो काठ काटंत७ कष्टे कुद्दारैं ॥६०२॥ बहैं सील अंगं परैं पार होई । मनो रुंड मैं नाग लपटंत सोई ॥ कटारी लगैं अंग दीसंत पारं । मनो नारि मुग्धा कढ्यौ पानि बारं ॥६०३॥ छुरी वार सूरं करैं जार ऐसे । मना सपंनो पुच्छ दीखंत जैसे ॥ लगैं जोर सों यों विषाएं जवाँन । हुवैं अंग पारं जुटैं जर बाँनं !६०४!। भए लत्थ वत्थं दुहूँ सेन ऐसे । मनो यों अधारे भिरे मल्ल जैसे ॥ पछारैं उखारैं भुजा सीस सूरं । उछारैं८ हँकारैं उठैं९ बीर नूरं ॥६०५॥ मची मांस मेदं धरा कीच भारी । १ कातरं । २ दुट्टैं । ३ झुटूटैं । ४ हाँक । ५ कम्माँन । ६ बाजंत । ७ कष्ट, कष्टंत । ८ उछल्लैं, हकल्लैं । ६ उडैं । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

१५२ हम्मीररासो चली मुट्ठि खेतं नदी मैं १ अकारी॥ बनैं कूल पीलं सुडोलं सु बग्गी। बहै बांच २ लोहू जलं धार गज्जी। ॥६०६॥ रथं चक्र आवर्त्त सो भौर मानो। घनं धंस बेला कुलं रूप मानो॥ नरौ ग्राह पावं करं खर्प जैसे। बनी अंगुरी मीन झींगा सु तैसे॥६०७॥ बहैं सीस इंदोवरं जानि फूले ३। खुले नैन यों चंचरीकं सु भूले॥ सिवालं सु केसं सुबेसं विराजैं। बने घाट बीसों खरे सूर गाजैं ॥९०८॥ भरैं जुगनी खप्परे सूर लोहो। मनो गाम बामा पनीहार सोही॥ करैं केलि भैरव हरं संग काली। मनो न्हात बैसाष कात्तिकवाली॥६०९॥ इसे घाट ओघाट ४ किन्ने ५ हमीरं। डरै कायर ६ साह कै मीर पीरं॥ भजी साह सेना सबै लाज डारी। भिरे खेत चहुवाँन गज्जंत ७ भारी ॥९१०॥ किते गिद्ध जंबू करालं सु चिल्ली। बगं ८ हंस केते बिहंगं सु झिल्ली॥ परे खेत साहं सिकंदर सु नामी। सवा लक्ख कंधार कै मीर बामी ॥९११॥ गिरे खेत हथ्थी ९ सतं पौन ऐसे।


१ बह। २ बिच्चि। ३ फुल्ले, भुल्ले अंत्यानुप्रास। ४ घट्ट औघट्ट। ५ कीने। ६ कातरं। ७ गाजंत। ८ वकं। ६ हाथी। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

[Page Header] हम्मीररासो १५३

मनो पब्वतं¹ अंग दीखंत जैसे ॥ कसे साठि² हौदा परे खेत माहीं । ज़रावं जरं कंचनं कै सुमाहीं । ६१२॥ परे डंबर' सौ कई गज्जराजं । कई प्राणहीनं कई मो समाजं ॥ परे सत पंचं निसानन्नवारे । किते फग्जराजं परे खेत भारे ॥९१३॥ सवा लक्ख बाजी परे जे अमाँनं । परे खेत साहं सिकंदर सुजाँनं ॥ तिनै साह³ लक्खं बँधारं सवायं । परे एक⁴ लक्खं दिलीसं सुपायं ॥९१४॥ दुहूँ इक्क⁵ मीरं परे खेत नामी । कहूँ नाँम ताकै परै खेत बामी ॥ परे दूसरे मीर सिर खाँन भारी । रहे खेत महरम्म खाँनं सुधारी ॥ ९१५॥ परे जौमजादेन से मीर नामी । मोहोबत्त मुद्दफ्फर परे इक्क ठामी ॥ परे नूर मीरं अफर्रस्स धोरं, । बली इक्क निज्जाँम दीनं सु पीरं ॥९१६॥ परे मीर एते दुहूँ खेत सूरं । बहै नोर ड्यों रक्त⁶ बाहंत कूरं⁷ ॥ नची जुग्गनी और भैरव सु नच्चैं । भखैं गिद्ध आमिष जंबू सु रुच्चैं ॥९१७॥ थके सूर रथ्थं सु जाँमं सवायं । महाबीर घायं स घूमंत तायं ॥


[Footnotes] १ पब्वयं । २ सट्ठि । ३ सांत । ४ इक्क । ५ एक । ६ रक्त । ७ सूरं, पूरं । CC Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

१५४ हम्मीररासो बरै अच्छरी सूर१ बीरं सु अच्छे । खुले मोक्ष२ द्वारं प्रबेसंत गच्छे ॥१९८॥ भयौ मंडलं कुडलं भाँन नहं । कढ़े सूर बीरं सु धीर उपहं ॥ महा रौद्र भौ खेत देखत जानो। कियौ अद्भुतं देव सो जुद्ध मानो३ । १९९॥ परे खेत खंधार मीरं सु राते । इके लक्ख हज्जार पंचास४ जाते ॥ इतै सूर हम्मीर कै संहस च्यारं । सु तो बीर धीरं खुले मोक्ष द्वारं ॥९२०॥ दोहरा छंद तब हमीर हर ध्याँन करि, हर हर हर उच्चारि। गज निज सनमुख५ पेलि कै, जुरे६ साह सौं रारि ॥९२१॥ त्रोटक छंद गजराज हमीर सु पेलि७ बरं । मुख तै उचरंत सु भाव हरं ॥ किरवाँन८ कढ़ी वलवाँन हथं । सनमुख्खं सु साहि सु बोलि९ जथं ॥९२२॥ सुनिये सु अलावदि बैन अयं । करि द्वंद सु उद्व सु जुद्ध धयं ॥ सब सेन कहा करिहैं सु सुधं । हम आपन१० इक्क११ करैं सु जुधं ॥६२३॥ दुहुँ ओर उछाह अथाह सजे ।

१ आय । २ मोच्छि । ३ जानौं । ४ पच्चीस । ५ सम्मुख पेलि कै । ६ जुरिग, जुरिउ । ७ पिल्हि । ८ कम्माँन चढ़ी । ६ बुल्लि गयं। १० अप्पन । ११ एक । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो १५५ हजरत्ति सु कोप अकथ्य¹ रजे ॥ सनमुख हमीर सु आय² जुटे। सब सथ्य जथारथ बेग³ हटे ॥९२४॥ तिहिं खेत⁴ खरे⁵ चहुवाँन नरं । पतिसाह सबै दल भज्जि⁶ भरं ॥ रहे मीर . उजीर कछूक तवै । चहुवाँनन कै दल देखि⁷ जबै ॥९२५॥ पतिसाह कही यह कौन बनी । सब सैन बड़ी⁸ चहुवाँन तनी ॥ तब मंत्र वजीर सु एमि कह्यौ⁹ । तुम मित्र सदा गुन जानि लह्यौ ॥६२६॥ सुनिराव सु दूत पठाय दयौ । चहुवाँनन सों हित जानि ठयौ ॥ अब¹⁰ विग्रह छाड़ि¹¹ सु संधि करो । चहुवाँनन सों हित जानि डरो¹² ॥ अपराध हमें सब दूरि करो । तुम होहु अभै हम कूच धरो ॥९२७॥ नृप सों चर जाय कही तबहीं¹³ । सुनि राव यहै मुख वत्त¹⁴ कही ॥ अब खेत चढ़े कछु संधि नहीं । यह बत्त हमारि सुजानि सही ॥९२८॥ रिपु तैं बिनती¹⁵ सुइ कातरता । १ अगत्थ । २ आनि । ३ देखि । ४ अत्त, ग्रत्थ, ग्रर्थं । ५ अरे । ६ भाजि । ७ दिक्खि, पिक्खि । ८ बढ़ी । ६ कियौ, लियौ अंत्यानुप्रास । १० व्यग्रह । ११ छंदि । १२ दुहुँ ओर महा सुख भूरि भरो । १३ जबही । १४ ब्रात । १५ बिन्नति । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

१५६            हम्मीररासो          अब १ बृत कहे छल चातुरता ।      अब जाहु यहाँ हम सेन सजी ।          बिन साह को जुद्ध करंत ज़जो ॥९२९॥            वचनिका • अब राव हम्मीर दूत कौं नीति सहित२ उत्तर दियौ अरु युद्ध को उछाह कियौ आपणां उमरावों सों कही आयुध ३ छत्तीस ४ सों च्यारि आवधां सूं युद्ध कीजे५ अर जग मैं अमर जस लीजे ॥ तोप, बाण, चादरि, हथनालि, जंबूर, बंदूक, तमंचा, कमाँन, सेल इन६ नै त्यागो । अरु आयुध च्यारि लीजे । तरवारि, छुरी, कटारी, बिषाण, मल्ल युद्ध करि हजरति नै हाथ दिखावो तौ सायुज्य मुक्ति पावो ॥ पातसाह की ज्यान बखसीस करो और अच्छरी ७ बरो यह हम्मीर की आज्ञा साथै धरि राव हम्मीर कै उमरावाँ केसरिया साज बणाया अरु बेहरा बाँधि पातसाह की फौज परि हाँको८ कियौ ॥            त्रोटक छंद      कछु जंत्र न तोप न' कंत९ नहीं ।        तजि चापन चक्रन बाँन जिहीं ॥      किरवाँन१० लई कर बाजि चढ़े ।        चहुवाँन अमाँन सुखेत बढ़े ॥९३०॥      उत मीर बजीर रु साहि निजं ।        करि कोप तबै पतिसाह सजं ॥      तरवारि दुधार अपार बहै ।        सब साहि सु सैन समूह दहै ॥९३१॥

• १ अरु नृत्य ( व्यर्थ ) । २ संजुक्त । ३ आयुध । ४ छः तीस मैं । ५ किजिये । ६ यन । ७ अप्छरा । ८ हल्लो । ९ रुकंत । १० कम्माँन ।

हम्मीररासो १५७ कटि ग्रीव भुजा धर यों बिफरे १ । मनु काटि करे रस कृत्त हरे ॥ उड़ि रन्थ परे धर रुंड उठे। २चहुवाँन धरासह धार उठे ॥९३२॥ सिर मारत हाँक३ परे धर मैं। धर जुझत जुद्ध करै अरमैं ॥ कर जोर कटार सु अंग बहैं। बहु खंजर पंजर देह दहें ॥९३३॥ बहु रंचक४ मुष्ट कबन्ध परै५ । मल जुद्ध समृद्ध सुबीर करै ॥ पचरंग अनगिय खेत बन्यौ। बकसी६ तब साह सों बैन भन्यौ ॥९३४। भयभीत सु साह की फौज७ भगी । घमसाँन मसाँन सु ज्योति जगी ॥ परियो चकसी लखि नैन तबै । उलटो गज कीन८ सु साह जबै ॥९३५॥ इक संग उजोर९ न और नर । फिरि रोकिय१० साह अनंत भर ।॥ चहुवाँन धरम्म सु जानि कहै। यह मारत साहि सु पाप अहै ॥९३६॥ अभिषेक लिलाट कियौ इन कै। महि ईस कहावत है तिन कै११ ॥ धरि अग्र१२सु साह को पील जबै । १ बिहरे । २ बहु श्रोण धरा जु अपार उठे । ३ हक्क । ४ रंजक । ५ भरैं । ६ बकसी नृप साहि कौ आप हन्यौ । ७ सैन । ८ किन्न । ६ वजीर । १० रुक्किय । १२ विनके । १२ अग्ग । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

१५८ हम्मीररासो जहँ राव हमीर सु लाय पगै ॥६३७॥ अब साहि सु राव कही तबहीं । तुम जाहु दिली न डरो अबहीं ॥ लखि साह कौ लोग मुरकि चल्यौ । नृप आप हमीर सु खेत मिल्यौ ॥९३८॥ वचनिका राव हम्मीर का उमरावाँ तरवारि कटारियाँ सों जुद्ध कियौ १ पातसाह का अमीर उमरावाँ सूं मल्ल जुद्ध करचौ २ तदि ३ पातसाह की फौज ४ बिकल होकर पातस्याह तैं छोड़ छोड़ भागी हम्मीर को रावताँ पातस्याह ने हाथी सुद्धां घेरि ल्याया ॥ हम्मीर के आगे ल्या खड़ो करचौ । राव हम्मीर पातसाह ने देखि आपणाँ रावताँ सों कही यानै छोड़ देओ यह ने पृथ्वीस कहै छै या अदंड [छै] ॥ यह सुनि पातसाह ने छोड़ दियौ ५ । पातसाह ने उह की फौज मैं पहुँचाय दियौ । पतसाह वहाँ से खेत छोड़ कूँच कियौ ६ ॥ दोहरा छंद छाड़ि खेत पतसाहू तब, परे ७ कोस द्वै जाय । हसम सकल चहुवाँन न, लीनौ ८ तबै छिनाय ॥९३६॥ लिये साह नीसाँन तब, बाना जिते बनाय । और सम्हारि सु खेत कौ, घायल सोधि उठाय ॥६४०॥ सब कै जतन कराय कै, देस काल सम आय । राव जीति गढ़ कौ चले, हर्ष न हृदय समाय ॥९४१॥ बिन ' जाने नृप हर्ष मैं, गए भूलि ९ यह बात । १ कीधौ । २ बादसाह का अमीर उमरावाँ सूं मल्ल जुद्ध करि छुरी कटारी सों रंजका कौ प्रहार करचौ । ३ सजीभूत । ४ सेन । ५ दीधौ । ६ कीधौ । ७ परिय । ८ लिन्नौ । ६ भुल्हि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो १५९ साह निसाँन सु अग्र¹ करि, चले भवन हर्षोत ॥६४२॥ पद्धरी छंद भगि साह सेन जुत उलट आय । तजि विविध भाँति बाना² जु ताहिं ॥ सब साह हसम लीनी छिनाय । नृप सकल खेत सोधो कराय ॥६४३॥ बजि दुंदुभि जय जय धुनि सु आय । सत्र घायल नृप लीने उठाय³ ॥ करि अग्ग⁴ साह नीसाँन भुल्लि । लखि भूप हसम हर कह्यौ फुल्लि ॥९४४॥ सब राज लोक तिय जिती जानि । सब सार परस्पर हरी⁵ आनि⁶ ॥ चहुवाँन दुग्ग किन्नौ प्रबेस । यह सुनिय राव तिय मरन सेस ॥९४५॥ चहुवाँन आनि देख्यौ सु गेह । सिव बचन यादि कीनौ सु येह ॥ नृप सकल संग कौ सीख दीन । रावत्त राण मंत्रो प्रबीन ॥६४६॥ तुम जाहु जहाँ रतनेस आय । किज्जे न सोच नृपता बनाय ॥ चहुवाँन राय हम्मीर आय । हर मंदिर महँ प्रबिसंत जाय ॥९४७॥ करि पूजन भव⁷ गणपति मनाय । बहु धूप दीप आरति बनाय ॥ हो गिरजा गणपति सुमम देव । १ अग्गा । २ नाना । ३ उचाय । ४ अग्र । ५ हनी । ६ पानि । ७ बहु । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

१६० हम्मीररासो तुम जाँनत हो मम सकल भेव ॥९४८॥ अपबर्ग देहु तुम नाथ सिद्धि । तन छत्र धम्मे दीजे¹ प्रसिद्धि ॥ करि ध्याँन संभु निज सीस हथ्थ² । नृप तोरि कमल ज्यों किय अकथ्थ ॥६४६। यह सुनिय साह निज श्रवण बात । चलि हर मँदिर कौ साह् आत ॥ जलधार नैन लखि राव कर्म्म । कहि साहि मोहि दीनौ न मर्म ॥९५०॥ कछु दियौ हमें उपदेस नाहिं । तुम चले आप बैकुंठ माहिं ॥ तुम अभय बाँह दीनी जु सेष । जुग जुग नाँम राख्यो बिसेष ॥९५१॥ अरु महादानि तुम भए भूप । इच्छा सदाँन दीने अनूप ॥ जगदेव मोरध्वज तैं बिसेष । जस जयौ लोक तुम रक्खि सेख ॥९५२॥ वचनिका* ......आगै (अग्गै ) साह कै नीसान देखि राणी आसमती आपणा परिवार समेति परस्पर प्रहार करि खंग ( खग्ग ) प्रहार कर्च्यौ । जोहर करि देह त्यागी । सो राव हम्मीर ब्यौरो सुन्यौ और सिव कै बचन यादि कर्च्यौ । और यह निश्चय


१ दिजिय । २ मथ्थ ।

  • हस्तलेख में एक पन्ने के न होने के कारण पूरी वचनिका नहीं दी जा सकी ।—संपादक CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो १६१ जानी कि बर्ष चौदह १४ पूरे भए गढ़ की अवधि पूर्ण हुई तातैं यह सरीर राखनो (रख्खनो) उपहास्य है और छिन भंग सरीर कौ राखनो आछ्यौ नहीं। यह बिचारि सिव कै मंदिर गए और आप एक सेवग कनै राखि सिव कौ षोड़स प्रकार पूजन कर्यौ और यह बर्दान माँग्यौ कि हे सिव तुम ईश्वर हो। सेवक हृदय कै जाननहारे हो और सबकै प्रेरक हो तातैं हम्मीर (हमरी) यह प्रार्थना है मुक्ति दीजे तो सायुज्य दीजे। जन्म जन्म बिषैं छत्रीकुल मैं जन्म पाऊँ यह कहि कै खंग (खग्ग) आप हाथ ले कै सीस उतारचौ सिव पिंडी पै चढ़ाय दियौ तब सदाशिवजी प्रसन्न होय कै आसीर्बाद दियौ तिहारे कुल की जय होय ॥ दोहरा छंद साह कहत हम्मीर साँ, लेहु मोहि अब संग। धर्म रोति जानो सु तुम, सूर उदार अभंग ॥९५३॥ पद्धरी छंद मुसकाय सीस बोल्यौ सु बानि। तुम करो साह मम बचन कानि ॥ हम तुम सु एक जानो न और । तजि मोह देह त्यागो सु तौर ॥९५४॥ लीजे¹ सुमाँफ सागर सु जाय। तब मिलै आप² अप्पै सु आय ॥ यह कहिस सीस सुख मूँदि होत। तब साहि ग्याँन हृद भौ उदोत । ६५५॥ उठि साह सीस बदन सु कीन। करि प्रणाम संभु को ध्यान लीन ॥ १ लिजिय । २ अप्प । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

१६२ हम्मीररासो हजरत्त१ आय डेरै सु तब्ब। उज्जीर मीर बोले२ सु सब्ब ॥९५६॥ तुम जाहु सकल दिल्ली सथाँन। अलबृतहिं राज दीजे सु आँन॥ नहिं करो मोर अज्ञा सु भंग। सेवक्क धर्म्म यह है अभंग। ९५७॥ दोहरा छंद आयसु पाय सु साह की, चढ़े सकल सजि सैन। महरम खाँ उज्जीर तब, आए३ दिली सु ऐन ॥९५८॥ दयौ राज सिर छत्र धरि, अलाब्रूत्त तिहिं काल। घरि घरि अति आनंद जुत, यह बिधि प्रजा सुपाल ॥६५९॥ रणतभँवर कै खेत कौ, कीनौ सकल प्रमाँन। प्रथम हने रणधीर ने, बहुरि सेन परिवान ॥६६०॥ दोय लक्ख रूमी परे, दोऊ कुँवर उदार। सेन आरबी४ की जिती, हनी जु असी हजार ॥९६१॥ हने मीर द्वै सत सतरि, और सिकंदर साह। अट्ठ३ लक्ख खंघार कै, हने मीर निज आह ॥९६२॥ सवा सहस गजराज५ परे, दोय लख बाजि प्रसिद्ध। द्वादस लख सेना प्रबल, हनी हमीर सुसिद्ध ॥९६३॥ मस्तक राव हमीर कौ, किय६ सुमेर हर आप। मुक्ति७ द्वार सबई खुले, बिद्या बर्ष सुथाप ॥ ६४॥ छप्पय छंद बिदा कीन८ उज्जीर कूँच९ दिल्ली कौ कीनौ१०। १ हजरत्ति। २ बुले। ३ आयउ दिल्लिय ऐन। ३ अरब्बिय। ४ अष्ट। ५ गयमत्त। ६ कियौ। ७ मोक्ख द्वार सब खुल्लिये। ८ कियउ। ९ कुच्च। १० किन्नव, लिन्नव अंत्यानुप्रास। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो १६३ तब सुसाह तजि संग बचन हजरत को लीनौ ॥ सेतबंद पर जाय पूजि रामेस्वर नीकै । परे सिधु मैं जाय करे मन भाते जी कै ॥ उर्वसी साह हम्मीर नृप सेख मीर सब नाक गय । करि लोकपाल आदर अखिल जय जय जय हम्मीर कय ॥१६५॥ मिले स्वर्ग मैं जाय साह हम्मीर हरक्खे । महिमा मीररु बाल विविध मिलि सुमन बरक्खे ॥ जय जय जय हम्मीर सकल देवन मुख गाए । लोक अमर कीरत्ति मुक्ति परलोक सुपाए ॥ माणिक्य¹ राव चहुवाँन कुल दैन खङ्ग² दोऊ³ धरत । कहि जोधराज यह बंस मैं ननकारी नहिंन करत ॥१६६॥ दोहरा छंद सुनत राव हम्मीर जस, प्रीति सहित नृप चंद । मनसा बाचा कर्मना, हरे जोध कै द्वंद ॥१६७॥ चंद्र नाग बसु पंच गिनि, संवत माधव मास । सुक्ल सु त्रतिया जीव जुत, ता दिन ग्रंथ प्रकास ॥१६८॥ भूपति नीवागढ प्रगट, चन्द्रभाँन चहुवाँन । साँम दाँम अरु भेद जुत, दंडहिं करत खलाँन ॥१६९॥ इति श्रीमन्महाराजाधिराज-राजराजेंद्र-श्रीमदखिल-चाहुवाँन- कुल-तिलक नीमराना-अधिपति श्रीमहाराजा चंद्र- भाँनजी-देवाज्ञया कवि जोधराज विर- चितं यवनेश अलावद्दीन प्रति हम्मीरयुद्धं समाप्तम् ॐ मुमुक्षु भवन वेदान्त पुस्तकालय ॐ १ माणक्य। २ खग्ग । ३ उद्धरत । आगत क्रभा... 0026........ CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri दिनांक...

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(काशी नागरी-प्रचारिणी सभा) CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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